Sunday, June 14, 2026
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लेन-देन विवाद पर SC-ST एक्ट नहीं,31 साल पुराना फैसला पलटा: हाईकोर्ट ने कहा- निजी या व्यावसायिक डिस्प्यूट को जातिगत रूप देना कानून का सरासर दुरुपयोग – Jodhpur News


राजस्थान हाईकोर्ट ने 31 साल पुराने एक मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दो व्यक्तियों के बीच निजी या व्यावसायिक लेन-देन के विवाद को SC-ST एक्ट का रूप देना कानून का सरासर गलत प्रयोग है। जस्टिस फरजद अली की कोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में

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कोर्ट ने वर्ष 1994 में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द करते हुए आरोपी शोरूम मालिक को बरी कर दिया है।

निजी व्यावसायिक विवाद को दिया आपराधिक रंग

कोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले के तथ्यों को देखने से साफ है कि यह विवाद पूरी तरह से ‘व्यावसायिक और अनुबंधित’ प्रकृति का था। यह विवाद एक विक्रेता और ग्राहक के बीच पैसे के लेन-देन का था, न कि जातिगत अपमान का।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी (दुकानदार) द्वारा बकाया राशि की मांग करना कानूनी रूप से जायज था। निचली अदालत ने एक निजी विवाद में SC/ST Act के कड़े प्रावधान लागू करके कानून का गलत प्रयोग किया है।

आपसी लेनदेन का विवाद और वो भी चारदीवारी के भीतर हुआ था। (इमेज सोर्स – AI)

‘चारदीवारी’ के भीतर अपमान SC-ST एक्ट के दायरे में नहीं

फैसले का सबसे अहम कानूनी पहलू ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक्ट की धारा 3(1)(x) तभी लागू होती है, जब अपमानजनक घटना सार्वजनिक स्थान पर या जनता की नजरों के सामने हुई हो।

कोर्ट ने नक्शा मौका का हवाला देते हुए कहा कि कथित घटना शोरूम के अंदर ‘चारदीवारी के भीतर’ हुई थी। यह एक बंद जगह थी जहां आम जनता की सीधी पहुंच या दृश्यता नहीं थी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि चूंकि घटना सार्वजनिक दृष्टि में नहीं थी, इसलिए SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता।

मोटर साइकिल की ईएमआई और रिपेयरिंग के पेमेँट को लेकर हुआ था विवाद। (इमेज सोर्स - AI)

मोटर साइकिल की ईएमआई और रिपेयरिंग के पेमेँट को लेकर हुआ था विवाद। (इमेज सोर्स – AI)

विवाद बाइक फाइनेंस, किश्त और रिपेयरिंग के रुपयों का

दरअसल, जोधपुर निवासी शिकायतकर्ता राजन सोलंकी ने 22 अगस्त 1991 को रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि जोधपुर के ही पुंगलपाड़ा आरोपी बृजमोहन उर्फ राजा ने उन्हें जानबूझकर जाति का हवाला देते हुए अपमानित, धमकाया और शारीरिक रूप से हमला किया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि यह आचरण SC/ST Act की धारा 3(1)(x) और IPC की धारा 323 के तहत अपराध है।

विवाद की असली वजह व्यावसायिक थी। राजन सोलंकी ने अप्रैल 1990 में बृज मोहन के शोरूम से बजाज मोटरसाइकिल लोन पर खरीदी थी, जो बजाज ऑटो फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से लोन पर ली थी। सोलंकी ने मासिक किस्तों का भुगतान नहीं किया और उनके कई चेक बाउंस हो गए, जो ट्रायल के दौरान स्वीकृत तथ्य है।

इस दौरान मोटरसाइकिल का एक्सीडेंट हो गया और उसे बृज मोहन के शोरूम में मरम्मत के लिए लाया गया। मरम्मत का खर्च लगभग 10 हजार रुपए आया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जब सोलंकी वाहन लेने गए तो उन्होंने डिमांड ड्राफ्ट से भुगतान की पेशकश की, जिसे बृज मोहन ने मना कर दिया और नकद या चेक में भुगतान की मांग की। आरोप है कि इसी बातचीत के दौरान बृज मोहन ने सोलंकी को उनकी जाति का हवाला देकर अपमानित किया और शोरूम से बाहर धक्का दे दिया।

ट्रायल कोर्ट का फैसला

जांच के बाद IPC की धारा 323 और SC/ST Act की धारा 3(1)(x) के तहत चार्जशीट दायर की गई। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने सात गवाह पेश किए और दस्तावेजी साक्ष्य दिए, जबकि बचाव पक्ष ने तीन गवाह और 12 दस्तावेज पेश किए। 19 सितंबर 1994 को स्पेशल जज ने बृज मोहन को दोनों धाराओं के तहत दोषी ठहराया और छह महीने की साधारण कैद और एक हजार पांच सौ रुपए जुर्माना की सजा सुनाई गई। इसी फैसले के खिलाफ बृज मोहान ने हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पब्लिक व्यू के पहलू को भी विस्तार से स्पष्ट किया। (इमेज सोर्स - AI)

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में पब्लिक व्यू के पहलू को भी विस्तार से स्पष्ट किया। (इमेज सोर्स – AI)

हाईकोर्ट ने कहा- विशेष कानून का गलत इस्तेमाल

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के रवैये पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि –

  • “ट्रायल कोर्ट ने विशेष दंड कानून के कठोर प्रावधानों को एक ऐसे तथ्यात्मक मामले पर लागू किया, जो मूल रूप से एक निजी व्यावसायिक विवाद से उत्पन्न हुआ था। इस तरह के दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप कानून का स्पष्ट गलत अनुप्रयोग हुआ।”
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST Act की धारा 3(1)(x) का विधायी उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र में अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों पर किए गए जातिगत अपमान को रोकना है। यह कानून व्यावसायिक या निजी विवादों को निपटाने के लिए नहीं बना है।
  • कोर्ट ने कहा कि शारीरिक हमले के आरोप के लिए कोई मेडिकल एविडेंस नहीं थी। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष का यह दावा साबित नहीं हुआ कि सोलंकी ने डिमांड ड्राफ्ट से भुगतान की पेशकश की थी। कोर्ट ने कहा कि डिमांड ड्राफ्ट का कोई भी सबूत या बैंक रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया, जिससे आरोपी का यह तर्क सही साबित होता है कि विवाद केवल बकाया भुगतान को लेकर था।

कोर्ट ने माना कि यह मामला दीवानी (Civil) प्रकृति का था जिसे आपराधिक रंग दिया गया। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने 1994 के फैसले को रद्द करते हुए आरोपी बृज मोहन को सभी आरोपों से बरी कर दिया और उसकी जमानत मुचलके खारिज कर दिए।



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