Tuesday, June 2, 2026
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क्या है खपली गेहूं आटा, कैसे गायब हुआ और क्यों हो रही वापसी, हड़प्पा कालीन अनाज


पता नहीं आपने भारत के प्राचीन खपली गेहूं का नाम सुना है या नहीं लेकिन अब फिर इसका नाम सुनाई पड़ने लगा है. इसकी वापसी हो रही है. इसे फ्यूचर का आटा बताया जा रहा है. भारतीय भोजन परंपरा में इसकी गहरी जड़ें हैं. जानते हैं कि ये कैसा गेहूं है. अब क्यों लंबे समय बाद इसकी वापसी हो रही है. ये कहां और कब उगाया जाता है. भारत के बेस्ट शेफ इसे क्यों चुनने लगे हैं.

खपली आटा दरअसल खपली गेहूं से बनता है. यह गेहूं की एक बहुत पुरानी किस्म है, जिसे भारत में हजारों वर्षों से उगाया जाता रहा है. आधुनिक गेहूं आने से पहले दक्कन और दक्षिण भारत के कई इलाकों में यही प्रमुख गेहूं था. महाराष्ट्र और कर्नाटक में इसके दाने का बाहरी आवरण अपेक्षाकृत सख्त और मोटा होता है. इसी कारण इसे खपली कहा जाने लगा.

‘खपली’ नाम महाराष्ट्र और कर्नाटक में सबसे अधिक प्रचलित है. दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इसे एमर, इटली में फारो मेडियो और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में सांबा कहा जाता है.

पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि मौजूदा समय में पाकिस्तान में स्थित मेहरगढ़ में 6000-5000 ईसा पूर्व से ही एमर गेहूं की खेती होती रही है. इसकी खेती हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में की जाती थी.

हड़प्पा काल में खपली गेहूं की रोटी की खेती की जाती थी. उस समय इसी गेहूं के आटे का इस्तेमाल रोटी बनाने में होता था. (AI Image)

अचानक इसकी चर्चा क्यों होने लगी?

पिछले कुछ वर्षों में लोगों की रुचि “पारंपरिक अनाज” और “लो-प्रोसेस्ड फूड” की ओर बढ़ी है. मधुमेह, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं के कारण लोग ऐसे अनाज तलाश रहे हैं जिन्हें अधिक प्राकृतिक माना जाता है. इसी वजह से खपली आटा फिर चर्चा में आ गया है.
– इसमें अपेक्षाकृत अधिक फाइबर होता है
– प्रोटीन अच्छा होता है
– ग्लाइसेमिक इंडेक्स अपेक्षाकृत कम माना जाता है
– पेट देर तक भरा महसूस होता है
– इसकी तीन चपातियां दैनिक फाइबर जरूरतों का करीब 34% प्रदान करती हैं. ये आयरन और बी विटामिन का अच्छा स्रोत है.

भारत के जाने माने शेफ क्यों करा रहे इसकी वापसी

भारत के कई नामी शेफ खपली आटे की वापसी सिर्फ “हेल्थ ट्रेंड” की वजह से नहीं करा रहे, बल्कि इसके पीछे स्वाद, बनावट, इतिहास और भारतीय खाद्य विरासत का भी बड़ा कारण है. शेफ कहते हैं कि आधुनिक गेहूं ने स्वाद खो दिया है. जो आधुनिक गेहूं उगाया जा रहा, वो अमूमन विदेशों से आया और उगाने और पैदावार में बेहतर था लेकिन इस प्रक्रिया में गेहूं का मूल स्वाद और सुगंध कम हो गई.

भारत के कई नामी शेफ खपली आटे की वापसी करा रहे हैं. उसके पीछे इसकी पौष्टिकता, स्वाद, बनावट, इतिहास और भारतीय खाद्य विरासत भी है. (AI Image)

खपली गेहूं में उन्हें एक अलग मेवों जैसी और गहरी स्वाद-परत मिलती है. इसी कारण देश के जाने माने शेफ इस आटे का इस्तेमाल करने लगे हैं. वो इसे रोटी, कुलचा और ब्रेड में इस्तेमाल कर रहे हैं.

इटली में जैसे पुरानी गेहूं किस्मों की वापसी हुई, वैसे ही भारत में भी कुछ शेफ और किसान पुराने अनाजों को वापस ला रहे हैं. खपली, रागी, कोदो, ज्वार और बाजरा इसी सोच का हिस्सा हैं. आजकल लोग खाने के साथ उसकी परंपरा और कहानी के बारे में सुनना चाहते हैं. खपली आटा एक “स्टोरीटेलिंग इंग्रीडिएंट” बन गया है जब किसी मेन्यू में लिखा होता है कि यह 2000 साल पुरानी गेहूं किस्म से बनी रोटी है, तो उसका सांस्कृतिक मूल्य बढ़ जाता है.

दिलचस्प बात यह है कि 1990 और 2000 के दशक में भारत के कई बड़े रेस्तरां पश्चिमी तकनीकों और विदेशी सामग्री पर केंद्रित थे. अब नई पीढ़ी के शेफ भारतीय खाद्य इतिहास की ओर लौट रहे हैं. वे ये देख, जान और परख रहे हैं कि
– हमारी असली रोटी कैसी थी?
– हमारे पूर्वज कौन-सा गेहूं खाते थे?
खपली इसी खोज का हिस्सा है. एक तरह से देखें तो भारत के बेस्ट शेफ खपली आटे को वापस इसलिए ला रहे हैं क्योंकि उन्हें इसमें सिर्फ गेहूं नहीं दिखता, बल्कि भारतीय कृषि इतिहास का एक खोया हुआ अध्याय दिखता है, जिसे वे फिर से थाली में लाना चाहते हैं.

क्या ये सुपर फूड है

नहीं, इसे “चमत्कारी सुपरफूड” मान लेना सही नहीं होगा. पोषण विशेषज्ञ भी कहते हैं कि यह सामान्य गेहूं का विकल्प हो सकता है, लेकिन कोई जादुई दवा नहीं है.

खपली गेहूं महाराष्ट्र, कर्नाटक में किसानों द्वारा सीमित तरीके से उगाया जा रहा है. हालांकि भारत में इसकी पैदावार कुल गेहूं की उपज की एक फीसदी ही है. (AI Image)

भारत में कहां उगता है?

ये गेहूं भारत में हर जगह नहीं उगता या उगाया जाता है. फिलहाल ये महाराष्ट्र, कर्नाटक में उगाया जा रहा है. गुजरात के कुछ हिस्सों में भी पैदा हो रहा है. सीमित मात्रा में मध्य प्रदेश में पैदा किया जा रहा है. विशेष रूप से महाराष्ट्र के पुणे, अहमदनगर, सोलापुर और विदर्भ क्षेत्र इसके लिए जाने जाते हैं.

ये कम क्यों होता है

दरअसल इसकी भी एक कहानी है. 1960-70 के दशक की हरित क्रांति के बाद किसानों को ऐसी नई गेहूं किस्में मिलीं जो ज्यादा पैदावार देती थीं, जल्दी तैयार हो जाती थीं, सरकारी खरीद में आसानी से बिक जाती थीं.

खपली गेहूं इनसे पीछे रह गया, क्योंकि इसकी उपज आधुनिक गेहूं की तुलना में कम होती है. किसान स्वाभाविक रूप से अधिक उत्पादन वाली किस्मों की ओर चले गए.

क्या ये विलुप्त हो गया था?

पूरी तरह नहीं, लेकिन बहुत सीमित क्षेत्र में सिमट गया. हरित क्रांति के बाद ये गेहूं मुख्यधारा से करीब गायब हो गया. केवल कुछ किसानों ने पारंपरिक रूप से इसकी खेती जारी रखी. आज फिर से अगर इसका दौर लौटता हुआ लग रहा है तो उसकी वजह उनकी बची हुई किस्मों की वजह से संभव हुआ है. हालांकि कुछ ब्रांडेड कंपनियां इसका आटा भी बाजार में ला रही हैं.

यह महंगा क्यों है?

आम भारतीय परिवार अब भी इसे नियमित रूप से नहीं खरीदते. सामान्य आटा जहां लगभग ₹40-60 प्रति किलो मिलता है, वहीं खपली आटा कई ब्रांडों में ₹150-250 प्रति किलो तक बिकता है. यानी 3 से 5 गुना महंगा. महंगा होने की वजह कम पैदावार, सीमित क्षेत्र में खेती सीमित क्षेत्र में खेती, जटिल प्रोसेसिंग, आपूर्ति कम है. इसे इसे अक्सर ऑर्गेनिक या प्रीमियम उत्पाद के रूप में बेचा जाता है.

क्या ये भविष्य का गेहूं बन सकता है?

संभावना कम है. भारत की 140 करोड़ आबादी को देखते हुए केवल खपली जैसे कम उपज वाले गेहूं पर निर्भर होना व्यावहारिक नहीं होगा लेकिन ये एक प्रीमियम, स्वास्थ्य-केंद्रित और पारंपरिक अनाज के रूप में अपनी जगह बना सकता है, ठीक वैसे ही जैसे मोटे अनाज यानि मिलेट्स ने बनाई.

हरित क्रांति के बाद देश के ज्यादातर किसान खपली गेहूं को”कम पैदावार वाला पुराना गेहूं” समझकर छोड़ चुके थे लेकिन अब वही “हेरिटेज ग्रेन” और “प्रीमियम हेल्थ फूड” के नाम पर बिक रहा है. (AI iMAGE)

हालांकि ये सच है कि जिस खपली गेहूं को 40-50 साल पहले किसान “कम पैदावार वाला पुराना गेहूं” समझकर छोड़ रहे थे, वही आज शहरों में “हेरिटेज ग्रेन” और “प्रीमियम हेल्थ फूड” के नाम पर कई गुना दाम में बिक रहा है.

इसमें एक गहरा अखरोट जैसा स्वाद, थोड़ा खुरदुरापन और आधुनिक गेहूं से बिल्कुल अलग संरचना दिखाई देती है. यह पानी को धीरे-धीरे सोखता है, ग्लूटेन को धीरे-धीरे विकसित करता है. धैर्य रखने पर बहुत अच्छा परिणाम देता है.

कैसे गूंथा जाता है

खपली के आटे को गूंधना सामान्य आटे से थोड़ा अलग अनुभव होता है. यह आटा कम लचीला होता है. इसमें ग्लूटेन की मात्रा कम होती है, इसलए यह आधुनिक गेहूं के आटे की तरह वापस अपनी जगह पर नहीं आता. इसमें थोड़ा अधिक पानी धीरे-धीरे डालना पड़ता है. हल्के हाथों से गूंधने के बाद दस से पंद्रह मिनट का आराम देने से इसका स्वाद और भी बेहतर हो जाता है. इसे बेलना आसान हो जाता है.

कैसी बनती हैं रोटियां

आप इसकी जो रोटियां बनाएंगे, वे दिखने में वैसी नहीं होंगी जैसी आप आमतौर पर खाती हैं. इनका रंग सामान्य आटे के हल्के क्रीम रंग के बजाय गहरा, लाल-सुनहरा होगा. ये देखने में अधिक देसी लगेंगी. अधिक पौष्टिक और घनी होंगी.



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