Thursday, June 18, 2026
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बघेलखंड की परंपरा से जुड़ा मीठा स्वाद गुलगुला, नोट करें झटपट वाली रेसिपी


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Gulgula Recipe: मीना द्विवेदी ने कहा कि स्वादिष्ट और मुलायम गुलगुले बनाने के लिए सबसे पहले एक कप गुड़ को डेढ़ कप गुनगुने पानी में अच्छी तरह घोल लें. इसके बाद इस घोल को छानकर ठंडा होने के लिए रख दें. अब दो कप गेहूं के आटे में एक चम्मच सौंफ और एक चौथाई चम्मच इलायची पाउडर मिलाएं.

सतना. बघेलखंड की पहचान सिर्फ उसकी बोली, लोकगीत और संस्कृति तक सीमित नहीं है बल्कि यहां के पारंपरिक व्यंजन भी लोगों के दिलों में खास जगह रखते हैं. इन्हीं में से एक है गुलगुला, जिसे कई लोग मीठा पुआ भी कहते हैं. गुड़, गेहूं के आटे और सौंफ से बनने वाला यह पारंपरिक पकवान आज भी गांवों से लेकर शहरों तक बड़े चाव से खाया जाता है. खास बात यह है कि इसे बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता और बेहद साधारण सामग्री से तैयार होने वाला यह व्यंजन स्वाद में किसी मिठाई से कम नहीं होता. शाम की चाय हो, त्योहार का मौका हो या घर में कोई छोटा-मोटा शुभ कार्य, गुलगुले की खुशबू माहौल को मीठा बना देती है.

बघेलखंड के घरों में गुलगुला सिर्फ एक व्यंजन नहीं बल्कि परंपरा का हिस्सा माना जाता है. वर्षों से महिलाएं इसे घर में बनाती आ रही हैं. गुड़ की प्राकृतिक मिठास और सौंफ की खुशबू इसे खास स्वाद देती है. ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मेहमानों के स्वागत या पारिवारिक आयोजनों में गुलगुले बनाए जाते हैं. यही वजह है कि नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक स्वाद से जुड़ी हुई है.

ऐसे तैयार करें गुलगुले का घोल
लोकल 18 से बातचीत में सतना निवासी मीना द्विवेदी ने बताया कि स्वादिष्ट और मुलायम गुलगुले बनाने के लिए सबसे पहले एक कप गुड़ को डेढ़ कप गुनगुने पानी में अच्छी तरह घोल लें. इसके बाद इस घोल को छानकर ठंडा होने के लिए रख दें. अब दो कप गेहूं के आटे में एक चम्मच सौंफ और एक चौथाई चम्मच इलायची पाउडर मिलाएं. फिर गुड़ का पानी धीरे-धीरे डालते हुए पकौड़े जैसा गाढ़ा घोल तैयार करें. ध्यान रखें कि घोल में किसी तरह की गुठलियां न रहें. इसके बाद घोल को ढककर लगभग 15 से 20 मिनट तक रख दें ताकि वह अच्छी तरह फूल जाए.

तलने का तरीका बनाता है स्वाद को खास
तलने से ठीक पहले घोल में एक चुटकी बेकिंग सोडा डालकर अच्छी तरह फेंट लेना चाहिए. इसके बाद कड़ाही में तेल या घी को मध्यम आंच पर गर्म करें. हाथों को हल्का गीला करके उंगलियों की मदद से घोल को छोटी-छोटी बॉल्स के रूप में तेल में डालें. गुलगुलों को लगातार अलट-पलट करते हुए मध्यम आंच पर लगभग पांच से छह मिनट तक तलें. जब उनका रंग सुनहरा और गहरा भूरा हो जाए, तब उन्हें बाहर निकाल लें. इस तरीके से बने गुलगुले बाहर से कुरकुरे और अंदर से नरम और जालीदार बनते हैं.

जन्मदिन और शुभ कार्यों का खास हिस्सा
पहले के समय विंध्य क्षेत्र में केक काटने का चलन नहीं था. ऐसे में बच्चों के जन्मदिन, नामकरण, पूजा-पाठ या अन्य मांगलिक अवसरों पर सबसे पहले गुलगुले बनाए जाते थे. बुजुर्गों का मानना था कि घर में मीठा बनने और कड़ाही चढ़ने से सुख-समृद्धि आती है. समय के साथ खाने-पीने की आदतें जरूर बदली हैं लेकिन बघेलखंड में गुलगुले का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है. त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और खास मौकों पर इसकी मौजूदगी अब भी देखने को मिल जाती है. बघेली लोकगीतों और लोक-संस्कृति में भी इसका जिक्र मिलता है. यही वजह है कि गुलगुला आज भी लोगों को अपने बचपन, गांव और पुरानी परंपराओं की मीठी यादों से जोड़ने का काम करता है.

About the Author

Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.



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