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म्यूचुअल फंड को लंबे समय में संपत्ति बनाने का एक प्रभावी माध्यम माना जाता है. यह निवेशकों को महंगाई को मात देने, बेहतर रिटर्न हासिल करने और कंपाउंडिंग की ताकत से बड़े वित्तीय लक्ष्य पूरे करने में मदद करता है. हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर म्यूचुअल फंड को हमेशा के लिए होल्ड करके रखा जाए. समय-समय पर निवेश की समीक्षा करना और जरूरत पड़ने पर बदलाव करना भी उतना ही जरूरी होता है.
म्यूचुअल फंड से एग्जिट का सही समय कैसे पहचानें? एक्सपर्ट्स ने बताए अहम संकेत. (Representative Image:AI)
नई दिल्ली. वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि ‘खरीदो और भूल जाओ’ वाली रणनीति हर परिस्थिति में सही साबित नहीं होती. कई बार निवेशक के लक्ष्य बदल जाते हैं, जोखिम उठाने की क्षमता कम या ज्यादा हो जाती है या फिर बाजार की परिस्थितियां बदल जाती हैं. ऐसे में पोर्टफोलियो को दोबारा संतुलित करना, कुछ मुनाफा बुक करना या कमजोर प्रदर्शन करने वाले फंड से बाहर निकलना समझदारी भरा कदम हो सकता है. नियमित समीक्षा से यह सुनिश्चित होता है कि निवेश अभी भी आपके वित्तीय उद्देश्यों के अनुरूप है.
लगातार कमजोर प्रदर्शन सबसे बड़ा संकेत
यदि कोई म्यूचुअल फंड लंबे समय तक अपनी श्रेणी के अन्य फंडों की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है, तो यह चिंता का विषय हो सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार केवल कुछ महीनों की गिरावट देखकर फैसला नहीं लेना चाहिए. किसी इक्विटी फंड का मूल्यांकन कम से कम तीन साल और बेहतर हो तो पांच साल के प्रदर्शन के आधार पर करना चाहिए. यदि फंड लगातार अपेक्षित रिटर्न नहीं दे पा रहा है और जोखिम के मुकाबले उसका प्रदर्शन कमजोर है, तो निवेशक को दूसरे विकल्पों पर विचार करना चाहिए.
फंड की रणनीति में बदलाव भी है चेतावनी
कई बार निवेशक किसी खास रणनीति या निवेश शैली को देखकर फंड चुनते हैं. लेकिन अगर समय के साथ फंड अपनी घोषित रणनीति से हटने लगे या उसके निवेश का तरीका बदल जाए, तो यह एक बड़ा रेड फ्लैग माना जा सकता है. उदाहरण के लिए, यदि कोई फंड खुद को बड़े शेयरों में निवेश करने वाला बताता है लेकिन धीरे-धीरे अधिक जोखिम वाले शेयरों में निवेश बढ़ा देता है, तो निवेशक का मूल उद्देश्य प्रभावित हो सकता है. ऐसी स्थिति में फंड की दोबारा समीक्षा जरूरी हो जाती है.
प्रबंधन और लागत पर भी रखें नजर
फंड मैनेजर और निवेश टीम की भूमिका म्यूचुअल फंड के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण होती है. यदि लगातार बदलाव हो रहे हों या प्रबंधन की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठ रहे हों, तो निवेशक को सतर्क हो जाना चाहिए. इसके अलावा, यदि फंड का खर्च अनुपात (एक्सपेंस रेशियो) बढ़ता जा रहा है और इससे संभावित रिटर्न प्रभावित हो रहे हैं, तो यह भी फंड बदलने का एक कारण बन सकता है. बढ़ती लागत लंबे समय में निवेशकों की कमाई को कम कर सकती है.
बदलते लक्ष्य और जरूरतें भी तय करती हैं एग्जिट
कई बार समस्या फंड में नहीं बल्कि निवेशक की परिस्थितियों में होती है. यदि किसी व्यक्ति का वित्तीय लक्ष्य बदल गया है, बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदने या किसी अन्य जरूरत के लिए धन चाहिए, तो निवेश रणनीति में बदलाव करना स्वाभाविक है. ऐसे मामलों में फंड से आंशिक या पूर्ण निकासी उचित हो सकती है. हालांकि विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि एग्जिट की योजना सोच-समझकर बनानी चाहिए ताकि टैक्स, एग्जिट लोड और बाजार के समय से जुड़े जोखिमों को कम किया जा सके.
भावनाओं नहीं, तथ्यों के आधार पर लें फैसला
विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में गिरावट, नकारात्मक खबरों या अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के कारण जल्दबाजी में म्यूचुअल फंड से बाहर निकलना अक्सर नुकसानदायक साबित होता है. इसके बजाय निवेशकों को ठोस आंकड़ों, प्रदर्शन के रिकॉर्ड और अपने वित्तीय लक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना चाहिए. अच्छी गुणवत्ता वाले और लक्ष्य के अनुरूप चुने गए म्यूचुअल फंड सामान्य बाजार चक्रों के दौरान लंबे समय तक बनाए रखे जा सकते हैं. लेकिन नियमित निगरानी और अनुशासित समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि आपका पोर्टफोलियो हमेशा आपके वित्तीय भविष्य की जरूरतों को पूरा करता रहे.
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Rakesh Singh is a chief sub editor with 14 years of experience in media and publication. International affairs, Politics and agriculture are area of Interest. Many articles written by Rakesh Singh published in …और पढ़ें

