नमस्कार, नरेश मीणा जी को पता नहीं SDM नाम से ही दुश्मनी है क्या, जेल जाने से पहले याद भी आए तो कंवरलाल। अशोक गहलोत जी इन दिनों ‘साइन लैंग्वेज’ बोल रहे हैं और ‘थैला’ दिखा रहे हैं। मौसम बरसात का हो या फिर चुनाव का ‘सांप-अजगर’ तो निकलेंगे ही। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. नरेश मीणा याद आए ‘कंवरलाल’? थप्पड़कांड से पहले नरेश मीणा की इतनी फैन फॉलोइंग नहीं थी। उन्होंने फेमस होने के लिए SDM साहब को चुना। हालांकि इसकी कीमत भी चुकाई। लेकिन राजनीति में इतना तो चलता है। नरेश मीणा जी चमक गए। हालांकि चुनाव हार गए लेकिन अपने अच्छे खासे प्रशंसक खड़े कर लिए। वे हर बार एक नया पासा फेंकते हैं और हलचल मचा देते हैं। टोंक में नगरफोर्ट थाने में सरेंडर करने से पहले वे एक गाड़ी पर चढ़े। समर्थकों के बीच ऐलान करते हुए बोले- 9 अगस्त को आदिवासी दिवस पर मेरी रिहाई की बात मत करना। झालावाड़ जेल में बंद कंवरलाल मीणा की रिहाई के लिए राज्यपाल से मांग करना। मेरे भाई की विधायकी खा गए। दम हो तो दिखा देना आदिवासियों। थप्पड़कांड में जेल जाने से पहले नरेश मीणा को भाजपा नेता और अंता से पूर्व विधायक कंवरलाल मीणा क्यों याद आए? इसलिए याद आए क्योंकि दोनों का अपराध एक जैसा है। कंवरलाल मीणा ने भी 20 साल पहले SDM की कनपटी पर बंदूक तानी थी। उसी के बदले 3 साल की सजा काट रहे हैं। लोग कंवरलाल के लिए आंदोलन करेंगे तभी तो नरेश मीणा को थप्पड़कांड से बचने की राह मिलेगी। कुछ भी हो बंदूक तानने के सामने थप्पड़ मारना कौन सी बड़ी बात है? 2. अशोक गहलोत का ‘जादुई थैला’ गुलाबी थैले में ऐसी क्या बात है कि पूर्व मुख्यमंत्री जी गाहे-बगाहे थैला दिखा देते हैं। थैला लेकर जाते बाइक सवारों का वीडियो बनाते हैं। ग्रामीणों से बात करते हुए थैले की महिमा सुनते हैं। दरअसल, जब से चीफ साहब ने ‘ऐरा-गैरा नत्थू खेरा’ शब्द का इस्तेमाल किया है और कार्यकर्ताओं को नारेबाजी को लेकर हिदायत दी है। तब से पूर्व मुख्यमंत्री जी खामोशी से ‘साइन लैंग्वेज’ बोल रहे हैं। जयपुर में बीते दिनों वे एक मूक-बधिर स्कूल पहुंचे और बच्चों के साथ वक्त गुजारा। उनकी साइन लैंग्वेज में उनकी तकलीफों पर बात की। स्कूल की अव्यवस्थाओं के बारे में बच्चों ने इशारों में बताया। बच्चे भी पूर्व मुख्यमंत्री की मौजूदगी से उत्साहित हुए। साथ में फोटो खिंचवाया। मोबाइल में सेल्फी ली। ये वो बच्चे थे जो नारे नहीं लगा सकते। गहलोत ने कहा था- नारे लगाने की जरूरत ही क्या है? मैं जब-जब मुख्यमंत्री बना तब नारे थोड़े ही लगे थे। जहां तक आलाकमान का सवाल है, वह देखता है कि फील्ड में कौन कितना काम कर रहा है। फीडबैक लेता है। सब कुछ उनके सामने होता है। पूर्व सीएम ने प्रदेश में ऐसा माहौल बना दिया है कि हर जगह वे एक लीडर की तरह दिखाई दे रहे हैं। लोगों से आत्मीयता से मिल रहे हैं। कार्यकर्ताओं को नारेबाजी से रोका जा सकता है, लेकिन अब आम लोग नारे लगा रहे हैं। हो सकता है बाकी नेताओं के पास भी कई तरह के हुनर हों। लेकिन जादुई थैला तो सिर्फ जादूगर के पास है। उसमें से कुछ न कुछ निकलता ही रहता है। 3. चलते-चलते… पाली का सादड़ी इलाका। यहां का छोटा सा गांव जाटों की डोरण। किसान महिला खेत में घास काट रही थी। अचानक उसके हाथ में अजगर की पूंछ आ गई। चौमासे में खेत-खलिहानों से सांप-अजगर, बिच्छू, कीट-पतंगे निकलते ही हैं। चुनाव में भी आस्तीनों से सांप निकलकर इधर-उधर भागते हैं। चौमासा और चुनाव में क्या समानता है? बहुत सारी समानताएं हैं। जैसे- चौमासे का भी सीजन होता है और चुनाव का भी। चौमासा भी हरियाली लाता है और चुनाव भी। चौमासे की हरियाली खेतों, पहाड़ों, नदियों, मैदानों पर दिखाई देती है और चुनाव की नेताजी के चेहरे पर। चौमासे में बादल गरजते हैं तो चुनाव में नेताजी। चौमासा जमीन को उपजाऊ करता है, चुनाव लोकतंत्र को। चौमासे में पानी बहकर द्वार-द्वार पहुंच जाता है, चुनाव में नेताजी घर-घर दस्तक देते हैं। घोषणाओं की बरसात होती है। वादों की बाढ़ आती है। बाढ़ में वोट बह जाते हैं। जाटों की डोरण गांव में तो जंगल विभाग के एक्सपर्ट ने अजगर को दबोच लिया। लेकिन चुनावी सांप अक्सर किसी आस्तीन में पनाह पा ही जाते हैं। इनपुट सहयोग- महावीर बैरवा (टोंक), खेताराम जाट (बाली, पाली)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब मंगलवार सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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