नमस्कार, उद्घाटन की बात पर गुस्साए पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने SDM साहब को नौकरी और नेतागिरी का फर्क बता दिया। जिन बकरियों को पूर्व मंत्रीजी हांक रहे थे उनमें ‘विरोधी खेमे’ का बकरा भी था और शिवजी के लिए पदयात्राओं के दौर में सद्दाम ‘हनुमानजी’ के लिए चल पड़ा। राजनीति और ब्यूरोक्रेसी की ऐसी ही खरी-खरी बातें पढ़िए, आज के इस एपिसोड में… 1. डोटासरा को SDM पर गुस्सा क्यों आया? नौकरी और नेतागिरी में क्या फर्क है? आप कहेंगे कि नौकरी परमानेंट होती है और नेतागिरी 5 साल का खेल है। लेकिन असल में यह मामूली फर्क है। असली अंतर यह है कि नौकरी बचाई जाती है और नेतागिरी चमकाई जाती है। प्रदेश कांग्रेस के चीफ साहब सीकर के लक्ष्मणगढ़ में खूब गरजे। गरजना अधिकार भी है, क्योंकि वे इस क्षेत्र से विधायक भी हैं। तो, जो वाकया चीफ साहब के साथ हुआ, वह उन्हीं की जुबानी कुछ इस प्रकार है- इलाके के SDM साहब ने अपनी मजाल और औकात को बढ़ाते हुए चीफ साहब के दफ्तर में फोन करके यह कह दिया कि डोटासरा जी फलां विकास का कार्य का उद्घाटन न करें। ईमानदारी से SDM साहब ने कारण भी साफ किया कि अगर उन्होंने उद्घाटन किया तो सरकार मेरे से नाराज हो जाएगी। चूंकि नौकरी बचाई जाती है। तो इसी नियम के हिसाब से SDM साहब ने अपनी नौकरी बचाने के लिए ऐसा सुझाव दिया। जिसे माननीय ने मंच से सार्वजनिक कर दिया। सार्वजनिक किया सो किया, उद्घाटन करने की रीति-नीति का बखान कर दिया। कौन कर सकता है, कौन नहीं कर सकता। इसके बाद SDM साहब को खरी सलाह देते हुए बोले- तू तेरी नौकरी संभाल। मैं मेरी नेतागिरी संभाल लूंगा। 2. चुनावी सीजन और ‘बकरी’ सिंगल लेन सड़क थी। दोनों ओर हरियाली थी। सड़क पर चरवाहे थे। चरवाहों के पास बकरियों का झुंड था। झुंड के पीछे नेताजी थे। नेताजी के एक हाथ में छतरी थी। दूसरे हाथ में लाठी थी। यह सामान्य दृश्य नहीं था। यह पूर्ण रूप से राजनीतिक दृश्य था। जो प्रतीक के रूप में पेश किया जा रहा था। पथ पर निरंतर आगे बढ़ती बकरियां ‘सबका साथ-सबका विकास’ का प्रतीक थीं। जिसने इसे सामान्य आंखों से देखा, उसने कहा कि पूर्व कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी किसी कार्यक्रम से लौटते हुए चरवाहों को देख रुके। इसके बाद बकरियों को हांकने लगे और यह उनके जन-जुड़ाव का नमूना है। लेकिन सूक्ष्मदृष्टा यानी छिद्रान्वेषी अर्थात पैनी नजर वाले समझ जाएंगे कि जो हरियाली नजर आ रही है वह चुनावी सीजन के कारण पैदा हुई है। हाथ में छतरी अपना बचाव करते हुए आगे बढ़ने की है। दूसरे हाथ में लाठी जनता पर पकड़ की ताकत है। बकरियों का झुंड क्षेत्र की जनता है। चरवाहे कार्यकर्ता हैं। अब यह समझने में शायद कठिनाई न हो कि बकरियां बूथ की तरफ बढ़ रही हैं। पंचायत और निकाय चुनाव सिर पर हैं। अच्छा नेता वही जो लोकतंत्र की भेड़-बकरियों को हांक कर सही मुकाम की तरफ ले जाए। नेताजी ने बकरियों के बीच चल रहे एक बकरे को प्यार से सहलाया। लेकिन उसे यह रास नहीं आया। उसने पलटकर सींग मारने की कोशिश की। शर्तिया यह बकरा या तो बागी है या फिर विरोधी खेमे का कार्यकर्ता। कुल मिलाकर इस तरह के मोहक और प्रतीकात्मक दृश्य अब चुनाव तक दिखते रहेंगे। देखिए, समझिए और आनंद लीजिए। 3. चलते-चलते.. सावन का महीना चल रहा है। शिवजी के प्रसन्न करने के लिए पदयात्राएं-कांवड़यात्राएं चल रही हैं। इन्हीं पदयात्राओं के बीच एक पदयात्रा सद्दाम अली की भी है। सद्दाम जोधपुर से चला है अजमेर शरीफ के लिए। शिवजी की पदयात्रा के दौर में सद्दाम अली ‘हनुमानजी’ के लिए पैदल चल रहा है। उसके हनुमान RLP प्रमुख वाले हनुमान बेनीवाल हैं। नागौर सांसद। सद्दाम चाहता है कि हनुमान बेनीवाल राजस्थान के मुख्यमंत्री बनें। इस मन्नत के साथ वह पदयात्रा निकाल रहा है। रास्ते में आरएलपी के कार्यकर्ता उसे रोक-रोककर मालाएं पहना रहे हैं और नारेबाजी कर रहे हैं। इस पदयात्रा से संभव है कि हनुमानजी प्रसन्न हों और सद्दाम से वर मांगने को कहें। यही मौका है पार्षदी-पंचायती का आशीर्वाद पाने का। चुनावी सीजन जो है। इनपुट सहयोग- सुरेंद्र खदाव (रणसी, जोधपुर), स्वप्निल सक्सेना (सीकर), मुकेश नागर (बूंदी)। वीडियो देखने के लिए सबसे ऊपर फोटो पर क्लिक करें। अब कल सुबह 7 बजे मुलाकात होगी।
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