नई दिल्ली. ऊंची दुकान का फीका पकवान वाली कहावत तो आपने भी सुनी होगी. अब इसे अमेरिका पर अप्लाई करके देखें तो कई चौंकाने वाले फैक्ट सामने आएंगे. अमेरिकी अर्थव्यवस्था को दुनिया में सबसे बड़ा और विकसित माना जाता है. लेकिन, क्या आपको पता है कि इस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा कर्ज भी लदा है. इतना कि इसे उतारना अमेरिका के लिए भी अब असंभव जितना मुश्किल हो गया है. यही वजह है कि उस पर आने वाला कोई भी जोखिम अब पूरी दुनिया के लिए परेशानी का सबब बन चुका है. फिलहाल अमेरिका के वित्त मंत्री यानी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने अपनी अर्थव्यवस्था को थामने के लिए कुछ फैसले किए हैं, जिसका असर दुनियाभर के शेयर बाजारों पर दिखने वाला है.
सबसे पहले आपको यह बता दें कि अमेरिका पर इतना दबाव क्यों है और उसके वित्तमंत्री के माथे पर पसीना क्यों झलक रहा है. इसे आप ऐसे समझें कि अमेरिका अपने ज्यादातर खर्चे या यूं कहें कि अर्थव्यवस्था को बॉन्ड बाजार के भरोसे ही चलाता है. चूंकि, इस पर कर्ज काफी ज्यादा हो चुका है तो उसके बॉन्ड मार्केट पर भी इसका असर दिखने लगा और यील्ड बढ़ने से बॉन्ड बाजार में गिरावट दिखने लगी है. इसे थामने के लिए वित्त मंत्री ने 19 अगस्त को ऐलान किया कि वह बॉन्ड बाजार में डेट बायबैक ऑपरेशन को डबल करने वाले हैं.
क्यों उठाया ऐसा कदम
अमेरिकी वित्त मंत्री को यह कदम तब उठाना पड़ा, जब उसका लॉन्ग टर्म ट्रेजरी यील्ड 20 साल से भी ऊपर पहुंच गया. अमेरिका पर करीब 40 ट्रिलियन डॉलर यानी भारतीय अर्थव्यवस्था का 10 गुना ज्यादा कर्ज लदा है. ट्रेजरी यील्ड बढ़ने की वजह से ही वित्तमंत्री ने बायबैक प्रोग्राम को 9 सितंबर से दोगुना बढ़ाकर 4 अरब डॉलर प्रति सेशन कर दिया गया है. यह फैसला खासकर 10 से 20 साल और 20 से 30 साल वाले बॉन्ड पर लिया गया है. इसका मकसद अमेरिका पर कर्ज की लागत को कम करना है.
कैसा है अमेरिकी बॉन्ड मार्केट
अमेरिका के बॉन्ड बाजार में अभी भारी उथल पुथल मची हुई है. बॉन्ड की कीमत गिर रही है, जिससे बॉन्ड यील्ड में लगातार उछाल आ रहा है. 30 साल की ट्रेजरी यील्ड 5.3 फीसदी पहुंच गई है, जबकि 10 साल की बॉन्ड यील्ड 4.7 फीसदी है. इतना ही नहीं, 24 जून से अब तक 2 साल और 10 साल की बॉन्ड यील्ड के बीच 29 आधार अंक का अंतर आ चुका है.
क्यों बढ़ रहा ट्रेजरी यील्ड
अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर का कर्ज हो चुका है, जबकि सरकार लंबे समय से बड़े राजकोषीय घाटे के साथ काम कर रही है. अनुमान है कि अमेरिकी खजाने पर 2.1 ट्रिलियन डॉलर का राजकोषीय घाटा है, जो उसकी जीडीपी का 6.4 फीसदी है. सरकार जितना ज्यादा कर्ज लेती है, उसके बॉन्ड में निवेश करने वालों पर उतना ही दबाव बढ़ता है और बॉन्ड की कीमत घटने से यील्ड बढ़ता जाता है. इससे बड़े राजकोषीय घाटे, कर्ज और ब्याज भुगतान का एक चक्र शुरू हो जाता है. इस भारी कर्ज का मतलब है कि अमेरिका को अपने रक्षा बजट से ज्यादा कर्ज के ब्याज भुगतान पर खर्च करना पड़ेगा, जबकि बच्चों के प्रोग्राम से डेढ़ गुना ज्यादा खर्चा करना होगा.
एआई निवेश ने बढ़ाया बोझ
अमेरिका में एआई इन्फ्रा में बढ़ते निवेश की वजह से भी बॉन्ड बाजार पर दबाव बढ़ा है. अमेरिकी चिप कंपनी Nvidia ने 500 अरब डॉलर का निवेश करने की बात कही है तो कुछ कंपनियों ने 200 अरब डॉलर का कॉरपोरेट बॉन्ड जारी है, जो अमेरिकी ट्रेजरी का करीब 25 फीसदी है. मेटा ने भी 420 अरब डॉलर के निवेश की बात कही है, जिससे कुल देनदारी 1.65 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गई है. ट्रेजरी पर निवेशकों का यील्ड बढ़कर 6.4 फीसदी से 7.5 फीसदी तक पहुंच गया है. इतना ही नहीं, 10 साल का बॉन्ड यील्ड 0.3 फीसदी बढ़ चुका है.
ईरान वॉर ने बढ़ाई मुसीबत
ईरान के साथ युद्ध ने ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट की कीमतें 118 डॉलर तक पहुंचा दी और अमेरिका में महंगाई दर 4.2 फीसदी हो गई. इसका मतलब है कि बाजार में खुदरा तेल 4 डॉलर प्रति गैलन पहुंच गई. महंगाई बढ़ने से निवेशकों ने लॉन्ग टर्म डेट में पैसे लगाने शुरू कर दिए और यही वजह रही कि 10 साल और 30 साल का बॉन्ड यील्ड बढ़कर 4.69 फीसदी और 5.21 फीसदी हो गया. कुछ दिन पहले ही फेडरल चेयरमैन केविन वॉर्श ने ब्याज दरों पर कोई फैसला नहीं करके सभी को चौंका दिया है.
इसका अमेरिका और दुनिया के लिए क्या मतलब
अमेरिकी नागरिकों पर इस बॉन्ड मार्केट का गहरा असर पड़ने वाला है. अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से लोन की औसत ब्याज दर 6.75 फीसदी पहुंच सकती है. इससे हर महीने होम लोन की ईएमाआई बढ़ेगी और लोगों के लिए घर खरीदना मुश्किल हो जाएगा. ब्याज बढ़ने से हाउसिंग बाजार पर भी दबाव आएगा और उपभोक्ताओं का खर्च सीमित होगा. इससे अमेरिका की कुल इकनॉमिक ग्रोथ भी सुस्त पड़ जाएगी. अमेरिकी ट्रेजरी पर पड़ने वाला दबाव दुनियाभर के फाइनेंशियल बाजार पर दबाव डालेगा. यूके, जर्मनी, फ्रेंच और जापान में भी बॉन्ड यील्ड बढ़ी है और दुनियाभर में कर्ज की लागत बढ़ रही है. इसका सीधा असर शेयर बाजार पर भी दिखने वाला है.

