Monday, October 12, 2026
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देवघर का फेमस मनभोग दुकान, शुद्ध घी सूजी खोवा ड्राई फ्रूट्स से बनता, रोज 50 KG खपत


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Deoghar Famous Mohanbhog Shop: देवघर को यूं ही देवों की नगरी नहीं कहा जाता. 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग यहां विराजमान हैं और सालभर देश के अलग-अलग हिस्सों से लाखों श्रद्धालु बाबा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए देवघर पहुंचते हैं. लेकिन देवघर की पहचान सिर्फ बाबा बैद्यनाथ मंदिर और धार्मिक आस्था तक ही सीमित नहीं है. यहां का खान-पान भी अपने आप में एक अलग पहचान रखता है. देवघर की गलियों में कई ऐसे पारंपरिक व्यंजन मिलते हैं, जिनका स्वाद आपको दूसरे शहरों में आसानी से देखने को नहीं मिलेगा. इन्हीं खास व्यंजनों में शामिल है बाबा मंदिर के सिंह दरवाजा के पास मिलने वाला मशहूर मोहनभोग, जिसकी खुशबू मंदिर के आसपास से गुजरने वाले श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच लाती है.

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सिंह दरवाजे के आसपास पहुंचते ही इस खास व्यंजन की खुशबू लोगों को अपनी ओर खींचने लगती है. शुद्ध घी, सूजी, खोवा और ड्राई फ्रूट्स से तैयार होने वाला मोहनभोग स्वाद में काफी अलग होता है. इसे तैयार करने में जल्दबाजी नहीं की जाती, बल्कि करीब 6 से 7 घंटे तक मेहनत करनी पड़ती है. यही वजह है कि इसका स्वाद और बनावट आम मिठाइयों से अलग नजर आती है. स्थानीय लोगों के साथ बाबा मंदिर में पूजा करने आने वाले श्रद्धालु भी यहां रुककर गर्मागर्म मोहनभोग का स्वाद लेते हैं. खास बात यह है कि इसे फलाहारी व्यंजन के रूप में भी खाया जाता है.

दुकानदार ज्ञानदेव जजवारे बताते हैं कि इस दुकान से मोहनभोग का सफर आज का नहीं, बल्कि 50 साल से भी ज्यादा पुराना है. इतने लंबे समय से एक ही तरह की पारंपरिक विधि से इसे तैयार किया जा रहा है. उनके मुताबिक यह व्यंजन देवघर के सिंह दरवाजा के आसपास की गलियों में ही अपनी खास पहचान रखता है. समय के साथ लोगों की पसंद और बाजार में कई तरह के नए स्वाद जरूर आए, लेकिन मोहनभोग का पुराना स्वाद आज भी लोगों को यहां खींच लाता है. यही वजह है कि दुकान पर स्थानीय ग्राहकों के अलावा बाहर से आने वाले लोगों की भी अच्छी भीड़ रहती है.

दुकानदार के मुताबिक रोजाना करीब 50 किलो मोहनभोग की खपत हो जाती है. बाबा मंदिर में दर्शन करने के बाद कई श्रद्धालु इसे प्रसाद की तरह अपने साथ लेकर जाते हैं. देवघर से दूर रहने वाले कुछ लोग यहां से मोहनभोग मंगवाकर भी इसका स्वाद लेते हैं. यानी सिंह दरवाजा की छोटी सी गली में तैयार होने वाला यह पारंपरिक व्यंजन अब सिर्फ स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है. इसकी मांग देवघर से बाहर रहने वाले लोगों के बीच भी बनी हुई है.

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ग्राहक अमन द्वारी बताते हैं कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से मोहनभोग का स्वाद लेते आ रहे हैं. उनका कहना है कि शुद्ध घी और खोवा से तैयार होने के कारण इसका स्वाद अलग महसूस होता है और मुंह में रखते ही इसकी मिठास घुलने लगती है. फिलहाल बाजार में मोहनभोग करीब 200 रुपये प्रति किलो की कीमत पर मिल रहा है. इसके साथ ही दुकान पर देवघर की लस्सी और गाजर का हलवा भी लोगों को पसंद आता है. इस तरह बाबा की नगरी में दर्शन के साथ यहां के पारंपरिक स्वाद का आनंद लेने की परंपरा भी लगातार आगे बढ़ रही है.

मोहनभोग की खासियत सिर्फ इसके स्वाद में नहीं, बल्कि इससे जुड़ी पुरानी परंपरा में भी है. पांच दशक से ज्यादा समय से तैयार हो रहा यह व्यंजन आज भी उसी इलाके में लोगों की पसंद बना हुआ है. बाबा मंदिर आने वाले श्रद्धालु पूजा के बाद जब सिंह दरवाजा की गलियों से गुजरते हैं, तो मोहनभोग की खुशबू उन्हें रोकने पर मजबूर कर देती है. यही वजह है कि देवघर की धार्मिक पहचान के साथ यहां का यह पारंपरिक स्वाद भी लोगों की यादों में अपनी अलग जगह बनाए हुए है.



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