पटना हाईकोर्ट ने BNMU के उच्च वर्गीय लिपिक पद पर नियुक्त कर्मचारियों को बड़ी राहत दी है। न्यायालय ने राज्य सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें इन नियुक्तियों को दी गई स्वीकृति रोक दी गई थी। कोर्ट ने विश्वविद्यालय और राज्य सरकार को कर्मचारियों
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न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा की एकलपीठ ने सिविल रिट अधिकारिता वाद संख्या 7250/2025 में यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वर्ष 2017 में की गई नियुक्तियों को केवल इस आधार पर अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि यूडीसी का पद पदोन्नति की श्रेणी में आता है। यह विशेष रूप से तब जब पूरी चयन प्रक्रिया न्यायालय के निर्देशों और राज्य सरकार की सहभागिता से पूरी हुई हो।
यूडीसी का पद पदोन्नति के माध्यम से भरा जाना चाहिए
याचिकाकर्ता चंद्र किशोर गुप्ता और राजेश कुमार ने 13 फरवरी 2025 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी नियुक्ति की स्वीकृति रोक दी गई थी। इस आदेश में कहा गया था कि यूडीसी का पद पदोन्नति के माध्यम से भरा जाना चाहिए, न कि सीधी भर्ती से। याचिकाकर्ताओं ने बताया कि वे वर्ष 1992 और 1995 से विश्वविद्यालय में दैनिक वेतनभोगी के रूप में कार्यरत थे।
बाद में, न्यायालय के निर्देशों के तहत वर्ष 2017 में एक विधिवत चयन प्रक्रिया के माध्यम से उनकी नियुक्ति की गई थी। उन्हें वर्ष 2019 में राज्य सरकार द्वारा स्वीकृति भी मिली थी और मई 2023 तक उन्हें नियमित वेतन मिलता रहा। हालांकि, इसके बाद अचानक उनका वेतन रोक दिया गया था, जिसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह वैध थी
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने दलील दी कि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह वैध थी और इसमें राज्य सरकार की सक्रिय भूमिका रही थी। वहीं, राज्य सरकार और विश्वविद्यालय की ओर से तर्क दिया गया कि यूडीसी का पद पदोन्नति का है, इसलिए सीधी नियुक्ति अवैध है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने पाया कि 2017 की नियुक्तियां न्यायालय के निर्देशों और राज्य सरकार द्वारा तय मानकों के तहत की गई थीं।
उस समय पद की प्रकृति को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी, ऐसे में कई वर्षों बाद उसी आधार पर नियुक्ति को अस्वीकार करना कानून के विरुद्ध है।
याचिकाकर्ताओं ने लंबे समय तक कार्य किया
न्यायालय ने यह भी कहा कि सरकार और विश्वविद्यालय पहले इस प्रक्रिया में शामिल होकर बाद में उससे मुकर नहीं सकते, क्योंकि यह ‘प्रोमिसरी एसटॉपल’ और ‘वैध अपेक्षा’ जैसे सिद्धांतों के खिलाफ है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं ने लंबे समय तक कार्य किया है, इसलिए उन्हें उनके काम का वेतन मिलना उनका अधिकार है।
काम किया है तो वेतन मिलेगा के सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने जून 2023 से लंबित वेतन और बकाया राशि के भुगतान का निर्देश दिया। साथ ही, बकाया वेतन पर 6 प्रतिशत वार्षिक साधारण ब्याज भी देने को कहा गया है, जिसकी गणना वेतन देय तिथि से भुगतान तक की जाएगी। न्यायालय ने उच्च शिक्षा विभाग द्वारा 13 फरवरी 2025 को पत्र को रद्द करते हुए राज्य सरकार और विश्वविद्यालय को आदेश दिया कि वे आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं का बकाया वेतन और ब्याज सहित भुगतान सुनिश्चित करें।

