Silver Price : चांदी में सप्लाई डिमांड का खेल नहीं, गिरने की कुछ और ही है वजह
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Silver Price Prediction : कमोडिटी बाजार का पारंपरिक नियम कहता है कि जब किसी चीज की मांग ज्यादा हो और आपूर्ति कम, तो उसके भाव बढ़ते हैं. लेकिन चांदी के मौजूदा बाजार में यह सिद्धांत पूरी तरह उलट चुका है. चांदी की सप्लाई कमजोर होने के बावजूद रेट लगातार गिर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में चांदी का भाव अब 50 डॉलर प्रति औंस से नीचे आ चुका है. सुक्डेन फाइनेंशियल के मुताबिक, इस साल भी बाजार में 46 मिलियन औंस चांदी की कमी रहने वाली है.
दरअसल, चांदी का भाव केवल खदानों से निकलने वाली धातु और कारखानों में होने वाली मांग से तय नहीं होता. सर्राफा बाजार पर इस समय सप्लाई और डिमांड के बुनियादी आंकड़ों के बजाय मैक्रो-इकोनॉमिक फैक्टर्स जैसे अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति, डॉलर इंडेक्स की मजबूती, बॉन्ड यील्ड और वायदा बाजार में संस्थागत निवेशकों की भारी मुनाफावसूली,ज्यादा हावी हो चुके हैं. जब इंटरनेशनल फाइनेंशियल सिस्टम में नकदी का बहाव बदलने लगता है, तो कमोडिटी के फिजिकल आंकड़े पीछे छूट जाते हैं. (Photo : Canva)
चांदी की कीमतों पर सबसे बड़ा असर अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के कड़े रुख और भविष्य में ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी के अनुमान से हुआ है. फेड ने हालिया बैठक में दरों को स्थिर जरूर रखा, लेकिन फ्यूचर्स मार्केट दिसंबर में 80% संभावना देख रहा है कि ब्याज दरें और बढ़ाई जा सकती हैं. अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड और डॉलर इंडेक्स निवेशकों को बिना किसी जोखिम के आकर्षक रिटर्न दे रहे हैं. चांदी या सोने पर कोई ब्याज नहीं मिलता, इसलिए बड़े हेज फंड्स और संस्थागत निवेशक चांदी से अपनी पूंजी निकालकर बॉन्ड बाजार और नकदी में पार्क कर रहे हैं. (Photo : Canva)
आमतौर पर दुनिया में जब भी भू-राजनीतिक तनाव या युद्ध के बादल गहराते हैं, तो सोने और चांदी को ‘सेफ हेवन’ मानकर खरीदारी बढ़ जाती है. लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है. निवेशक युद्ध की खबरों के बजाय इस बात पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं कि इस तनाव से कच्चे तेल, महंगाई और ब्याज दरों पर क्या असर पड़ेगा. अगर महंगाई भड़कती है, तो केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाने के बजाय लंबे समय तक ऊंची दरों का चाबुक चलाएंगे. यह कीमती धातुओं के लिए जहर साबित होता है. (Photo : Canva)
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बहुत से आम निवेशक सप्लाई डेफिसिट को गलत समझ लेते हैं और सोचते हैं कि इसका मतलब बाजार से चांदी का खत्म हो जाना है. सालाना डेफिसिट केवल यह दर्शाता है कि एक साल में नई माइनिंग और स्क्रैप रीसाइक्लिंग से आने वाली चांदी कुल खपत से कम है. इस गैप को लंदन और न्यूयॉर्क के बड़े वेयरहाउसों में रखे पहले से मौजूद विशाल भंडार से आसानी से पूरा कर लिया जाता है. रॉयटर्स के अनुसार, 2021 से अब तक इन वैश्विक वॉल्ट्स से करीब 762 मिलियन औंस चांदी निकाली जा चुकी है. (Photo : Canva)
गिरावट की एक और सबसे अहम आंतरिक वजह है सोलर पैनल उद्योग में तकनीक का तेजी से बदलना, जहां चांदी की खपत में भारी कटौती हो रही है. सौर पैनल निर्माता कंपनियां अपनी उत्पादन लागत घटाने के लिए हर फोटोवोल्टाइक सेल में चांदी की मात्रा कम कर रही हैं और तांबे पर आधारित तकनीकों की ओर बढ़ रही हैं.
सुक्डेन के वर्ल्ड सिल्वर सर्वे 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, सोलर सेक्टर में चांदी की खपत इस साल 19% घटकर 151 मिलियन औंस पर सिमट सकती है. वहीं जेपी मॉर्गन का मानना है कि यह गिरावट 30% तक पहुंच सकती है, जिससे अकेले सोलर क्षेत्र से करीब 60 मिलियन औंस की मांग हमेशा के लिए गायब हो सकती है.
इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV), आधुनिक पावर ग्रिड्स और तेजी से फैलते एआई डेटा सेंटर्स में चांदी की औद्योगिक खपत लगातार बढ़ रही है. लेकिन बाजार के जानकारों का मानना है कि यह नई मांग सोलर सेक्टर, आभूषण और सिल्वरवेयर में आई तेज मंदी की पूरी तरह भरपाई करने में फिलहाल नाकाम रही है. कुल औद्योगिक मांग का लगभग 57% हिस्सा रखने वाले सेक्टर्स में ठहराव आने से सटोरिया निवेशकों का हौसला टूट गया है.यही वजह है कि कागज पर सप्लाई की कमी दिखने के बावजूद बड़े बायर्स नए ऑर्डर देने के बजाय दाम और गिरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. (Photo : Canva)
तकनीकी चार्ट्स पर नजर डालें तो चांदी की स्थिति बेहद नाजुक दौर में पहुंच चुकी है. यह अपने 200-दिन के मूविंग एवरेज (DMA) से करीब 25% नीचे फिसल चुकी है. मनी मैनेजर्स और हेज फंड्स की नेट लॉन्ग पोजिशन 2024 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. यह बड़े खिलाडियों के चांदी से उठते भरोसे को दिखाता है. उनका मानना है कि भाव 50 डॉलर के नीचे फिसला, तो अगला मजबूत सपोर्ट सीधे 48 डॉलर पर है. यानी जब तक मैक्रो सेंटिमेंट नहीं बदलता, सप्लाई डेफिसिट की दलीलें चांदी को गिरावट से नहीं बचा पाएंगी.

