Wednesday, January 14, 2026
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UAPA 43D(5): शरजील-उमर केस में बेल क्यों बन गई अपवाद? आसान भाषा में समझिए


नई दिल्ली. दिल्ली दंगा मामले के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को अभी जेल में ही अपनी रातें काटनी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली दंगा के दोनों आरोपियों की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है, इस मामले के 5 अन्य आरोपियों को 12 शर्तों के साथ जमानत दे दी है. शरजील और उमर की जमानत याचिका खारिज करने की सबसे बड़ी वजह यूएपीए का धारा 43D(5) बनी. आखिर क्या कहता है ये सेक्शन और ऐसा क्या है इसमें जो जेल से बाहर आने में क्यों बना सबसे बड़ा रोड़ा. इस सेक्शन में कितनी सजा का है प्रावधान, जानें हर डिटेल….

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि उमर और शरजील की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा है कि दोनों एक साल तक इस मामले में जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकते हैं. ऐसे में दोनों आरोपियों को जमानत याचिका दोबारा से दाखिल करने के लिए नए आधार यानी ग्राउंड की जरूरत होगी. यह तभी संभव है जब मामले की सुनवाई नियमित हो और उस दौरान गवाही से कुछ ऐसे तथ्य सामने आए जिसके आधार पर बेल याचिका दोबारा से दाखिल की जा सके.

क्या है UAPA की धारा 43D(5)

इस धारा के मुताबिक, अगर किसी आरोपी पर UAPA के तहत मामला दर्ज है और चार्जशीट या केस डायरी के आधार पर कोर्ट को यह ‘प्रथम दृष्टया’ लगे कि आरोप सही हो सकते हैं, तो उस आरोपी को जमानत नहीं दी जाएगी. इसका मतलब यह हुआ कि इस धारा के चलते जमानत नियम नहीं, अपवाद बन जाती है. इतना ही नहीं कोर्ट को केस की गहराई में जाने की जरूरत नहीं होती और सिर्फ शुरुआती सबूत काफी माने जाते हैं.

कितनी सजा है इस कानून में?
धारा 43D(5) खुद सजा तय नहीं करती और यह सिर्फ जमानत पर रोक लगाती है. असल सजा UAPA की दूसरी धाराओं में होती है, जैसे:-

धारा अपराध सजा

सेक्शन अपराध सजा
13 गैरकानूनी गतिविधि 7 साल तक
16 आतंकी कृत्य उम्रकैद या मौत
18 आतंकी साजिश उम्रकैद
20 आतंकी संगठन की सदस्यता उम्रकैद
38 आतंकी संगठन से जुड़ाव 10 साल तक
39 आतंकी को सहायता उम्रकैद

इन धाराओं के साथ 43D(5) जुड़ते ही बेल बेहद मुश्किल हो जाती है.

कोर्ट ‘Prima Facie’ कैसे देखती है?
कोर्ट यह देखती है कि चार्जशीट में लगाए गए आरोप जांच एजेंसी के दस्तावेज सबूत सतही तौर पर विश्वसनीय हैं या नहीं. इस स्टेज पर बचाव पक्ष की पूरी दलील नहीं सुनी जाती है. सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में कह चुका है कि अगर प्रथम दृष्टया केस बनता है, तो लंबी हिरासत भी सही मानी जा सकती है. हालांकि, बहुत लंबी सुनवाई में देरी होने पर कभी-कभी संवैधानिक आधार पर बेल दी गई है.

किस बेंच ने सुनाया यह फैसला?
यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को आरोपियों और दिल्ली पुलिस की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद के निरंतर कारावास को आवश्यक नहीं माना और उनकी जमानत मंजूर कर ली.

उमर को मिली थी अंतरिम जमानत
उमर खालिद को सुप्रीम कोर्ट से जमानत नहीं मिली लेकिन दिसंबर महीने में बहन के निकाह के लिए कड़कड़डूमा कोर्ट ने खालिद को 16 दिसंबर से 29 दिसंबर तक की अंतरिम जमानत मंजूर की थी. अदालत ने अंतरिम रिहाई के साथ कुछ सख्त शर्तें भी लागू की थी, जिनमें उमर खालिद सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करेंगे, किसी भी गवाह से संपर्क नहीं करेंगे और केवल परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों से ही मिल सकेंगे. इसके अलावा, उन्हें 29 दिसंबर की शाम तक सरेंडर करना था.

कब उमर खालिद हुआ था अरेस्ट?
वहीं, दिल्ली पुलिस ने सितंबर 2020 में उमर खालिद को गिरफ्तार किया था. उस पर आरोप है कि उसने फरवरी 2020 में दिल्ली में बड़े पैमाने पर हिंसा की साजिश रची थी. इस मामले में यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम) के तहत केस दर्ज किया गया है. खालिद के साथ शरजील इमाम और कई अन्य लोगों पर भी इसी मामले में साजिशकर्ता होने का आरोप है. दिल्ली दंगे में कई लोगों की मौत हुई थी, जबकि करीब 700 से अधिक लोग घायल हुए थे. हिंसा की शुरुआत सीएए और एनआरसी के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई थी, जहां कई स्थानों पर हालात बेकाबू हो गए थे.

पिछली सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (जो दिल्ली पुलिस का पक्ष रख रहे हैं) ने कहा था कि 2020 की हिंसा कोई अचानक हुई सांप्रदायिक झड़प नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता पर हमला करने के लिए सुविचारित, सुनियोजित और योजनाबद्ध षड्यंत्र था.



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