Thursday, May 28, 2026
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एमपी में नगरपालिका-परिषद अध्यक्षों की कुर्सी फिर खतरे में: इसी महीने पूरी होगी अविश्वास प्रस्ताव लाने की मियाद; एक साल पहले बदला था कानून – Madhya Pradesh News


मप्र में एक बार फिर नगरपालिका और परिषद अध्यक्षों की कुर्सी पर खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है। कई जगह अध्यक्षों के खिलाफ दबे-छिपे अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारियां हो रही हैं। इसे देखते हुए मप्र नगर पालिका अध्यक्ष संघ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मांग

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दरअसल, पिछले ही साल अगस्त में सरकार ने कानून में संशोधन कर अविश्वास प्रस्ताव लाने की अवधि को 2 साल से बढ़ाकर 3 साल कर दिया था। साथ ही ये भी बदलाव किया था कि पार्षद तीन चौथाई बहुमत होने पर ही प्रस्ताव ला सकते हैं।

इससे पहले ये दो चौथाई बहुमत के साथ स्वीकार होता था। नियम में संशोधन के बाद भी अब अध्यक्षों के खिलाफ प्रस्ताव लाने की तैयारी हो रही है। इसमें खास बात ये है कि बीजेपी के ही पार्षद अपने पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ बगावत करने पर आमादा है। पढ़िए किन वजहों से सरकार ने नियम बदला था और इस समय किस तरह से राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं।

इस स्लाइड से समझिए पिछले साल क्या किया था बदलाव

नगर पालिका एसोसिएशन ने क्या मांग की है मप्र नगर पालिका अध्यक्ष संघ ने नगर पालिका और परिषद अध्यक्षों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की मियाद 5 साल करने की मांग मुख्यमंत्री से की है। इसके लिए एक पत्र भी लिखा है। संघ के अध्यक्ष जमनादास का कहना है कि इससे पहले जब अविश्वास प्रस्ताव लाने की मियाद 2 साल थी तब भी संघ ने सीएम को पत्र लिखकर इसे 5 साल करने की मांग की थी। उस वक्त सरकार ने इसे एक साल बढ़ाते हुए तीन साल किया। हमारी फिर से इसे 5 साल करने की मांग है।

6-11 अगस्त के बीच पूरा होगा 3 साल का कार्यकाल मंत्रालय सूत्रों का कहना है कि डा. मोहन सरकार ने भले ही अधिनियम बदलकर निकायों के अध्यक्षों को कुर्सी बचा ली, लेकिन तीन साल की अवधि पूरी होने पर पार्षद फिर अपने अधिकार का उपयोग करने की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि किसी भी निकाय में अविश्वास प्रस्ताव को लेकर खुलकर कोई सामने नहीं आया है।

इसकी वजह यह है कि निकायों में अध्यक्षों का तीन साल का कार्यकाल 6 अगस्त से लेकर 11 अगस्त के बीच पूरा होना है। इसके बाद ही अविश्वास प्रस्ताव कलेक्टर को दिया जा सकता है। ऐसे में अध्यक्षों के खिलाफ बगावती तेवर अपनाने वाले पार्षद पर्दे के पीछे रणनीति बना रहे हैं। माना जा रहा है कि पिछले साल जिन अध्यक्षों को कुर्सी से उतारने की कवायद हुई थी, इस बार वहीं अविश्वास प्रस्ताव आने की उम्मीद ज्यादा है।

पिछले साल इन निकायों के अध्यक्षों को हटाने के प्रस्ताव थे

देवरी: कलेक्टर को सौंपा जा चुका था अविश्वास प्रस्ताव देवरी नगर पालिका के 12 पार्षदों ने अध्यक्ष नेहा जैन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव कलेक्टर को सौंपा था। इस दौरान अध्यक्ष पर वार्डों में विकास कार्य न करवाने के आरोप लगाए थे। यहां 15 पार्षदों में से 13 बीजेपी और 2 कांग्रेस के पार्षद हैं। अध्यक्ष पद पर बने रहने के लिए अब उन्हें 12 पार्षदों का समर्थन चाहिए।

2022 में निकाय चुनाव के बाद से ही पार्षद दो धड़े में बंट गए थे।अध्यक्ष पद के लिए नेहा के खिलाफ भाजपा की ही आरती जैन मैदान में उतर गई थीं।

नर्मदापुरम: 21 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव पर साइन किए थे नर्मदापुरम में नीतू यादव 29 वोट लेकर नगर पालिका अध्यक्ष बनी थीं, लेकिन 2 साल का कार्यकाल (11 अगस्त 2024) पूरा होने से पहले ही उन्हें पद से हटाने के लिए 21 पार्षदों ने न सिर्फ मोर्चा खोल दिया था, बल्कि अविश्वास प्रस्ताव पर दस्तखत भी कर दिए थे। तब पार्षदों का आरोप था कि उनकी अनदेखी हो रही है और अध्यक्ष विकास कार्यों में रुकावट बन रही हैं।

टीकमगढ़: सम्मेलन की तारीख भी तय हो चुकी थी टीकमगढ़ नगर पालिका अध्यक्ष अब्दुल गफ्फार (पप्पू मलिक) को हटाने के लिए विशेष सम्मेलन की तारीख भी तय हो गई थी। यहां 19 पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। जिनमें से भाजपा के 11, कांग्रेस के 6 और 2 निर्दलीय पार्षद हैं। अधिकांश पार्षद, चाहे वह पक्ष हो या विपक्ष, अध्यक्ष की कार्यप्रणाली से नाराज चल रहे थे। यह नाराजगी 20 अगस्त 2024 को अविश्वास प्रस्ताव के रूप में सामने आई थी।

दमोह: वोटिंग तक पहुंची थी बात दमोह नगर पालिका में अध्यक्ष मंजू वीरेंद्र राय को पद से हटाने की तैयारी थी। मामला कलेक्टर के पास पहुंच गया था। लेकिन वोटिंग से पहले ही नए अध्यादेश से दोनों को राहत मिल गई थी। यहां भाजपा के 20 पार्षदों ने कलेक्टर को शपथ पत्र देकर अध्यक्ष को हटाने की मांग की थी।

दरअसल, नगर पालिका के 39 वार्डों में से भाजपा ने 14, कांग्रेस ने 17, सिद्धार्थ मलैया द्वारा बनाई पार्टी टीएसएम ने 5, बसपा ने एक और दो वार्डों में निर्दलीय जीते थे। बाद में टीएसएम के 5 और दोनों निर्दलीय भाजपा में शामिल हो गए। ऐसे में भाजपा पार्षदों की संख्या बढ़कर 21 हो गई।

5 नगर परिषदों में भी अविश्वास प्रस्ताव दिए गए थे

बानमोर: भाजपा जॉइन कर कांग्रेस नेता ने टाला था खतरा नपा अध्यक्ष के चुनाव में गीता जाटव को 9 वोट, जबकि कांग्रेस के कमल सिंह राजे को 6 वोट मिले थे। जाटव भले ही अध्यक्ष बन गईं, लेकिन भाजपा को डर था कि निर्दलीय पार्षदों ने पाला बदल लिया तो अध्यक्ष पद चला जाएगा। इस बीच उपाध्यक्ष राजवीर यादव और अध्यक्ष गीता जाटव के बीच पटारी नहीं बैठ रही थी।

दोनों के बीच परिषद कार्यालय में अध्यक्ष से विवाद हो गया था। इसे लेकर थाने में यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया था। इसके बाद यादव ने बीजेपी के 9 ,कांग्रेस के एक पार्षद को अपने पाले में लाकर 10 पार्षदों के समर्थन होने का पत्र कलेक्टर को सौंप दिया था। भाजपा के न्यू जॉइनिंग अभियान के दौरान कांग्रेस नेता राकेश मावई के साथ 4 पार्षदों ने भी भाजपा की सदस्य ले ली।

मऊगंज: अध्यक्ष के खिलाफ थे 15 में से 12 पार्षद मऊगंज नगर परिषद के अध्यक्ष बृजवासी पटेल भाजपा के होने के बाद भी सिर्फ तीन साल बाद वाले नियम से बच गए थे। यहां 15 में से 12 पार्षद अध्यक्ष पटेल के खिलाफ थे।

चाचौड़ा और कुंभराज: दोनों परिषद अध्यक्षों की कुर्सी खतरे में चाचौड़ा नगर परिषद अध्यक्ष भाजपा की सुनीता प्रदीप नाटानी के विरोध में 15 में से 13 व कुंभराज में शारदा साहू पर 15 में से 13 पार्षदों ने असंतोष था। लेकिन अविश्वास प्रस्ताव पर आगे कार्रवाई रोक दी गई थी। विरोध करने वाले पार्षदों की इस संख्या को देखें तो दोनों अध्यक्षों की कुर्सी खतरे में आ सकती है।

शाढोरा में 15 में से 8 पार्षदों ने विरोध किया अशोकनगर के नगर परिषद शाढोरा में 15 में से 8 पार्षदों ने नगर परिषद अध्यक्ष अशोक माहोर को हटाने का आवेदन दिया था। लेकिन माहोर को एक साल राहत मिल गई थी। अब अध्यक्ष को पद से हटाना है तो अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 12 पार्षदों की जरूरत होगी।

पिछले दरवाजे से अधिकारों को खत्म करने की कोशिश वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह कहते हैं कि समाजवादी चिंतक और नेता राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जिंदा कौम पांच साल इंतजार नहीं करती हैं। जो जनप्रतिनिधि ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, चाहे वह मेयर हो या नगर पालिका अध्यक्ष। ये उन्हें बचाने की ये कोशिश नजर आती है। पार्षद जनता के चुने प्रतिनिधि होते हैं, यदि वो नगर पालिका अध्यक्ष के काम से खुश नहीं है तो इसका मतलब ये है कि जनता खुश नहीं है।



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