Tuesday, April 14, 2026
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कर्नाटक कांग्रेस में संग्राम, CM सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक सचिव को पद से हटाया


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कर्नाटक कांग्रेस में संग्राम, CM सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक सचिव को पद से हटाया

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सिद्धारमैया ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में अपने राजनीतिक सचिव नजीर अहमद को पद से हटाया.

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कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी अब खुलकर सामने आ गई है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक सचिव नजीर अहमद को पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में पद से हटा दिया है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब दावणगेरे साउथ उपचुनाव के बाद पार्टी में फूट साफ दिखाई दे रही है. नजीर अहमद का इस्तीफा अचानक नहीं है. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस हाईकमान के कर्नाटक प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला ने सोमवार को शाम तक इस्तीफा देने की डेडलाइन दी थी. ऐसा नहीं करने पर बर्खास्तगी की चेतावनी भी दी गई. नजीर अहमद ने आखिरी समय में इस्तीफा सौंप दिया, जिससे बर्खास्तगी से बच गए. वे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी माने जाते हैं और मंत्री जामीर अहमद खान से भी जुड़े रहे हैं.

दावणगेरे साउथ उपचुनाव में विद्रोही नेता सदिक पैलवान को मनाने और पार्टी को नुकसान से बचाने की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई थी, लेकिन वे इसमें नाकाम रहे या दूरी बनाए रखी. इससे पहले केपीसीसी माइनॉरिटी विंग के अध्यक्ष अब्दुल जब्बार ने भी इस्तीफा दे दिया था, जिसे डिप्टी सीएम और केपीसीसी प्रमुख डीके शिवकुमार ने स्वीकार कर लिया. इसके साथ ही पूरे माइनॉरिटी विंग को भंग कर दिया गया. जब्बार ने इस्तीफा पत्र में माइनॉरिटी नेताओं में गहरी नाराजगी जताई और कहा कि उपचुनाव के दौरान उन्हें साइडलाइन कर दिया गया. आरोप लगे कि कुछ मुस्लिम नेता, जिनमें जामीर अहमद खान, नजीर अहमद और जब्बार शामिल थे ने एसडीपीआई उम्मीदवार को समर्थन दिया या फंडिंग में भूमिका निभाई. यहां तक कि 10 करोड़ रुपये की फंडिंग का भी जिक्र हुआ.

यह घटनाक्रम कांग्रेस की आंतरिक कमजोरी को उजागर करता है. दावणगेरे साउथ उपचुनाव में उम्मीदवार चयन और प्रचार की कमी ने फूट को बढ़ावा दिया. रिजवान अरशद और सलीम अहमद जैसे नेताओं ने पार्टी के कुछ सदस्यों पर विपक्ष के साथ मिलकर काम करने का आरोप लगाया. हाईकमान अब अनुशासन बहाल करने और गुटबाजी पर लगाम लगाने की कोशिश कर रहा है. नजीर अहमद का जाना इस दिशा में एक और कदम है.

सिद्धारमैया बनाम डीके शिवकुमार

यह संकट केवल उपचुनाव या माइनॉरिटी विंग तक सीमित नहीं है. इसके पीछे मुख्यमंत्री पद को लेकर सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डीके शिवकुमार के बीच लंबे समय से चल रही खींचतान है. 2023 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस हाईकमान ने अनौपचारिक समझौता किया था कि सिद्धारमैया ढाई साल सीएम रहेंगे और फिर शिवकुमार पद संभालेंगे. सिद्धारमैया इसे अपना आखिरी कार्यकाल बता चुके हैं, जबकि शिवकुमार पार्टी संगठन को मजबूत करने का दावा करते हैं. सरकार के आधे कार्यकाल के बाद शिवकुमार गुट के विधायकों ने दिल्ली में हाईकमान का दरवाजा खटखटाया. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि 10 से ज्यादा विधायक शिवकुमार के पक्ष में दिल्ली पहुंचे. सिद्धारमैया गुट ने इसका विरोध किया और कहा कि पांच साल का जनादेश है, कोई समझौता नहीं.

हाईकमान की चुनौती

कांग्रेस हाईकमान के लिए यह स्थिति मुश्किल है. एक तरफ सिद्धारमैया का प्रशासनिक अनुभव और जनाधार, दूसरी तरफ शिवकुमार की संगठनात्मक क्षमता. अगर जल्दी बदलाव हुआ तो सरकार अस्थिर हो सकती है. अगर नहीं हुआ तो शिवकुमार गुट नाराज रह सकता है. उपचुनाव के बाद की कार्रवाई हाईकमान का संदेश है कि फूट बर्दाश्त नहीं की जाएगी. नजीर अहमद और जब्बार की घटना माइनॉरिटी वोट बैंक को भी प्रभावित कर सकती है, जो कांग्रेस के लिए अहम है. पार्टी अब दावणगेरे में रिपोर्ट मांग रही है और अनुशासन बहाल करने की कोशिश कर रही है. लेकिन अगर सीएम पद की लड़ाई जारी रही तो 2028 के चुनाव में भाजपा को फायदा हो सकता है.

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