Sunday, May 31, 2026
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क्या देश में खत्म हुई क्रूड ऑयल की किल्लत, एक्सपोर्ट ड्यूटी घटाकर सरकार ने कर दिया इशारा?


नई दिल्ली. सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर लगने वाली ड्यूटी में कटौती कर दी है. 1 जून से शुरू होने वाले अगले पखवाड़े के लिए  पेट्रोल के निर्यात पर 1.5 रुपये प्रति लीटर शुल्‍क लगेगा. वहीं, डीजल पर 13.5 रुपये प्रति लीटर और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) के निर्यात पर 9.5 रुपये प्रति लीटर एक्सपोर्ट ड्यूटी देनी होगी. इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. क्या भारत के पास अब कच्चे तेल की इतनी पर्याप्त आपूर्ति होने लगी है कि वह पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने की स्थिति में पहुंच गया है. या फिर इसके पीछे कोई दूसरी मजबूरी और रणनीति काम कर रही है.

पहली नजर में यह फैसला थोड़ा हैरान करने वाला लगता है. वजह यह है कि पश्चिम एशिया में तनाव अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया की सबसे अहम तेल आपूर्ति लाइन बना हुआ है और भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे माहौल में सामान्य सोच यही कहती है कि सरकार को घरेलू बाजार के लिए ईंधन बचाने पर जोर देना चाहिए, न कि निर्यात को बढ़ावा देने पर.

क्या भारत में कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ गई है?

असलियत यह है कि भारत में घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन कोई बड़ी छलांग नहीं लगा रहा है. देश आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है. इसलिए निर्यात शुल्क में कटौती का मतलब यह नहीं है कि भारत अचानक तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर हो गया है या उसके पास अतिरिक्त कच्चे तेल का भंडार जमा हो गया है.

दरअसल भारत दुनिया के सबसे बड़े रिफाइनिंग केंद्रों में शामिल है. भारत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, उसे रिफाइन करता है और फिर पेट्रोल, डीजल तथा अन्य उत्पादों के रूप में दुनिया के कई देशों को बेचता है. यही वजह है कि कच्चा तेल आयात करने वाला देश होने के बावजूद भारत पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है.

फिर सरकार ने टैक्स क्यों घटाया?

इसका जवाब रिफाइनिंग कंपनियों के कारोबार में छिपा है. जब निर्यात पर ड्यूटी ज्यादा होती है तो रिफाइनरियों का मार्जिन घट जाता है. इससे उनके लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाता है. सरकार समय-समय पर वैश्विक कीमतों और बाजार की स्थिति के आधार पर इन ड्यूटी को घटाती या बढ़ाती रहती है.

संकेत यह हैं कि फिलहाल सरकार को घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता को लेकर तत्काल कोई बड़ा संकट नहीं दिख रहा. इसलिए उसने रिफाइनिंग कंपनियों को कुछ राहत देने का फैसला किया है. हालांकि ड्यूटी पूरी तरह खत्म नहीं की गई है, बल्कि सिर्फ कम की गई है. इसका मतलब सरकार अभी भी हालात पर नजर बनाए हुए है.

एक और वजह

वैश्विक अनिश्चितताओं और कीमतों में भारी उछाल के बावजूद, भारत का क्रूड ऑयल इम्पोर्ट बढ़ा है. मई के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का तेल आयात 11.2% बढ़कर 5.04 मिलियन बैरल प्रति दिन के स्तर पर पहुंच गया है. यह इस पूरे युद्ध काल का सबसे उच्चतम स्तर माना जा रहा है.रिफाइनरियों ने घरेलू स्टॉक को सुरक्षित करने के लिए खरीदारी तेज की है. यानी स्थिति अभी भले ही एकदम सामान्य न हो लेकिन पहले से बेहतर जरूर हुई है.

क्या इससे भारत में महंगाई बढ़ सकती है?

यही सबसे अहम चिंता है. अगर ज्यादा पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात होने लगते हैं और घरेलू बाजार में आपूर्ति पर दबाव बनता है तो डीजल और पेट्रोल की कीमतों पर असर पड़ सकता है. खासतौर पर डीजल भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है. ट्रकों से लेकर खेती और उद्योग तक, बड़ी गतिविधियां डीजल पर निर्भर हैं. अगर डीजल महंगा होता है तो माल ढुलाई की लागत बढ़ती है. इसका असर सब्जियों, अनाज, दूध और रोजमर्रा की वस्तुओं तक पहुंच सकता है. यानी महंगाई का जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. लेकिन भारत ने अपना काफी इम्पोर्ट डायवर्सिफाई कर दिया है और आयात लगभग नॉर्मल हो गया इसलिए निकट भविष्य में यह कोई परेशानी का कारण बनता नहीं नजर आता है.

सरकार का दांव क्या है?

सरकार फिलहाल एक संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है. एक तरफ वह रिफाइनिंग सेक्टर की कमाई और निर्यात प्रतिस्पर्धा को बनाए रखना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू बाजार में कीमतों को भी नियंत्रण में रखना चाहती है. यही कारण है कि निर्यात शुल्क में सीमित कटौती की गई है, कोई बड़ा और आक्रामक फैसला नहीं लिया गया.

आगे क्या देखना होगा?

आने वाले हफ्तों में तीन चीजें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहेंगी. पहली, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें किस दिशा में जाती हैं. दूसरी, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल आपूर्ति सामान्य रहती है या नहीं. और तीसरी, रुपये की चाल कैसी रहती है. अगर पश्चिम एशिया का संकट दोबारा गहराता है, तेल की कीमतें तेज उछाल लेती हैं या रुपये पर दबाव बढ़ता है, तो सरकार फिर से निर्यात ड्यूटी बढ़ाने जैसे कदम उठा सकती है. इसलिए आज की कटौती को भारत में तेल की भरमार का संकेत मानना गलत होगा. यह ज्यादा एक कारोबारी और रणनीतिक फैसला दिखता है, जिसका मकसद रिफाइनिंग उद्योग और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाना है.



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