Monday, May 25, 2026
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जिस हवा में सांस लेने को समझते हैं आजादी, वही 1000 दिन घटा रही आपकी उम्र


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देश में बहुत कम जगह ऐसी हैं जहां की हवा शुद्ध और प्रदूषण मुक्‍त है. एनसीआर के साथ ही देश के बड़े शहरों में प्रदूषण स्‍तर बहुत ज्‍यादा है और वह लंग कैंसर, टीबी और सीओपीडी जैेसी बीमार‍ियां देने के बाद औसत जीवन प्…और पढ़ें

जिस हवा में सांस लेने को समझते हैं आजादी, वही 1000 दिन घटा रही आपकी उम्रवायु प्रदूषण से युवाओं में लंग कैंसर, टीबी और सीओपीडी की बीमारी बढ़ रही है.
Air Pollution decreasing average life expectancy: भारत का युवा वर्ग जिसे देश के भविष्य की कार्यशक्ति माना जाता है, प्रदूषित हवा का भारी मूल्य चुका रहा है. दिल्ली-एनसीआर के अलावा बड़े शहरों की जिस हवा में खुलकर सांस लेने को आजादी समझा जाता है, विशेषज्ञों की मानें तो आज वही हवा युवाओं के फेफड़ों की सेहत तेजी से बिगड़ रही है. देश में हर साल लगभग 81,700 नए फेफड़ों के कैंसर के मामले सामने आ रहे हैं जो इस बढ़ते खतरे का अनुमान बता रहे हैं. इनमें ज्यादातर मामले उन शहरों से आ रहे हैं जहां प्रदूषण लेवल ज्यादा है.

डॉक्टरों की मानें तो जो बीमारियां कभी बुजुर्गों से जोड़ी जाती थीं, जैसे फेफड़ों का कैंसर, सीओपीडी और टीबी, अब युवाओं में दिखने लगी हैं. इससे जनसांख्यिकीय और आर्थिक आपदा की आशंका गहराती जा रही है. सुबह-सुबह धुएं में दौड़ने वाले युवा, ट्रैफिक जाम में फंसे पेशेवर और प्रदूषित कक्षाओं में बैठने वाले छात्र ये सभी रोजाना अपने फेफड़ों को नुकसान पहुंचा रहे हैं. यह अदृश्य चोट तब सामने आएगी जब देश को उनकी सबसे अधिक जरूरत होगी. आंकड़े बताते हैं कि जहरीली हवा भारतीय लोगों की औसत जीवन प्रत्याशा से लगभग 1,000 दिन पहले ही काट रही है. यह एक मौन क्षति है जिसे देश अनदेखा नहीं कर सकता.

देशभर में रेस्पिरेटरी समस्याओं को लेकर दिल्ली में जुटे वरिष्ठ पल्मोनोलॉजिस्टों ने कहा कि यह संकट सिर्फ बाहरी प्रदूषण तक सीमित नहीं है.ऐसे तमाम सबूत हैं जो बताते हैं कि रसोई का धुआं और बायोमास ईंधन गैर-धूम्रपान करने वाली महिलाओं में भी फेफड़ों के कैंसर का बड़ा कारण बन रहे हैं.बच्चों पर भी इसका गहरा असर देखने को मिल रहा है. निमोनिया अब भी दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौतों का 14% कारण है.जबकि भारत में टीबी की दर भी सबसे अधिक बनी हुई है. यहां हर एक लाख लोगों पर 195 मामले दर्ज हो रहे हैं.

रेस्पिकॉन 2025 के प्रोग्राम डायरेक्टर और चेयरमैन डॉ. राकेश के चावला ने बताया, ‘अगर हम फाइन पार्टिकुलेट प्रदूषण को आधा कर दें और सीओपीडी, अस्थमा और टीबी के लिए गाइडलाइन-आधारित इलाज अपनाएं, तो हर साल लाखों लोगों को अस्पताल में भर्ती होने से बचा सकते हैं और अपने लोगों के जीवन में स्वस्थ साल जोड़ सकते हैं. यह सिर्फ अस्पतालों या मरीजों की बात नहीं है, बल्कि एक पूरी पीढ़ी की ताकत और जीवटता को बचाने का सवाल है.’

वहीं डॉ. आदित्य चावला ने कहा कि श्वसन स्वास्थ्य भारत की जलवायु, कैंसर और बाल-जीवन रक्षा की कहानी एक साथ है. सबसे चिंताजनक यह है कि आज वही युवा वर्ग जो सबसे मजबूत होना चाहिए था जहरीली हवा के दाग अपने शरीर पर दिखा रहा है. अगर आज का युवा खुलकर सांस नहीं ले पा रहा तो देश का भविष्य भी उसके साथ घुट रहा है.2025 वह साल होना चाहिए जब हमने कार्रवाई करने का फैसला किया.

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priya gautamSenior Correspondent

अमर उजाला एनसीआर में रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रिया गौतम ने हिंदुस्तान दिल्ली में संवाददाता का काम किया. इसके बाद Hindi.News18.com में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रही हैं. हेल्थ एंड लाइफस्…और पढ़ें

अमर उजाला एनसीआर में रिपोर्टिंग से करियर की शुरुआत करने वाली प्रिया गौतम ने हिंदुस्तान दिल्ली में संवाददाता का काम किया. इसके बाद Hindi.News18.com में वरिष्ठ संवाददाता के तौर पर काम कर रही हैं. हेल्थ एंड लाइफस्… और पढ़ें

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