Wednesday, May 27, 2026
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पंजाब में डेरों का राज, यह आस्था है या बदलते धार्मिक समीकरणों की कहानी


Punjab Deras: पंजाब का सामाजिक और धार्मिक ताना-बाना धीरे-धीरे बदल रहा है? सिख धर्म ने लोगों को छुआछूत से मुक्ति दिलाने का वादा किया था. लेकिन जब जमीनी स्तर पर इसे लागू करने का समय आया तो वो सामाजिक समानता दिलाने में विफल रहा. सिख गुरुओं द्वारा अस्पृश्यता के खिलाफ दिए गए उपदेशों और समानता के प्रचार के बावजूद जातिवादी पूर्वाग्रह और वर्चस्व कायम रहा. इस बदलाव में ‘डेरों’ का उदय, पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं के साथ उनका टकराव और राजनीतिक दलों द्वारा उनका उपयोग सभी कुछ शामिल है. अनुयायियों की संख्या का एक बड़ा हिस्सा डेरों या संप्रदायों की ओर इसलिए आकर्षित हो रहा है. क्योंकि पंजाब के समाज के निम्न जातियों और निचले तबकों के लोग अपनी एक अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

डेरे या संप्रदाय उतने ही पुराने हैं जितना खुद सिख धर्म. हालांकि उनके अनुयायी हर जाति से आते हैं, लेकिन उनमें मुख्यतः दलित और अन्य पिछड़े वर्ग का बोलबाला है. पंजाब में डेरा शब्द का प्रयोग अक्सर ऐसे धार्मिक और सामाजिक केंद्रों के लिए किया जाता है जो किसी संत या आध्यात्मिक गुरु द्वारा स्थापित किए गए हैं. इन डेरों का पंजाब की सामाजिक और राजनीतिक संरचना पर गहरा प्रभाव है. ये डेरे अपने अनुयायियों को आध्यात्मिक शिक्षा देने के साथ-साथ कई तरह के सामाजिक कार्य भी करते हैं, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक सेवा. इन डेरों या संप्रदायों का नेतृत्व स्वयंभू बाबा कर रहे हैं, जिन्होंने रूढ़िवादी सिखों और अन्य लोगों के बीच सामाजिक तनाव का फायदा उठाया है. 

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डेरे देते हैं सामाजिक सुरक्षा और समर्थन
इन डेरों के बढ़ने से पंजाब में एक नया सामाजिक और धार्मिक विभाजन भी देखने को मिल रहा है. पारंपरिक सिख संगठन और रूढ़िवादी सिख इन डेरों को सिख धर्म के सिद्धांतों के खिलाफ मानते हैं. उनका मानना है कि ये डेरे सिखों को गुमराह कर रहे हैं. पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग गरीबी और बेरोजगारी से परेशान हैं. डेरे अक्सर ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ते हैं. उन्हें सामाजिक सुरक्षा और समर्थन का आश्वासन देते हैं. कुछ डेरे ऐसे हैं जो दलित और अन्य पिछड़ी जातियों के लोगों को आकर्षित करते हैं. इन जगहों पर उन्हें वह सम्मान मिलता है जो जातिगत भेदभाव की वजह से समाज में नहीं मिल पाता. आधुनिक जीवन में लोग मानसिक शांति और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की तलाश में हैं, जो उन्हें इन डेरों में मिलता है. 

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दलित सिखों की सबसे ज्यादा आबादी
पंजाब को अनुसूचित जातियों की सबसे बड़ी आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार 31.9 प्रतिशत, जबकि राष्ट्रीय औसत 16.6 प्रतिशत है) का घर होने का गौरव प्राप्त है, जिनका भूमि स्वामित्व में नगण्य हिस्सा है. इस आंकड़े के साथ, पंजाब भारत में सबसे अधिक अनुसूचित जाति की आबादी वाले राज्यों में से एक है. भूमिहीन दलित सिख न केवल खेती के लिए बड़े जमींदार जाट किसानों पर निर्भर रहे हैं, बल्कि जाट गुरुद्वारों में भी उनके साथ असमान व्यवहार किया जाता रहा है. परिणामस्वरूप उत्पन्न शून्यता को अधिक परंपरागत शाखाओं और सिख विरोधी डेरों ने भर दिया, जिन्होंने इन हाशिए पर पड़े समुदायों को सहायता प्रदान की. 

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डेरों ने दी एसजीपीसी को चुनौती
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक इतिहास की विद्वान बाबुशा मैंगी ने अपनी किताब ‘पंजाब में डेरों का उदय: इसकी निरंतरता और परिवर्तन’ में लिखा है, “कुल मिलाकर इन डेरों ने कट्टरपंथियों (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) को चुनौती दी, जो खुद को सिख धर्म का नायक बताते हैं. जिन्होंने सिख संस्थाओं और संगठनों में विभिन्न सिख समूहों (विशेषकर गैर-जाट) की सदस्यता को प्रतिबंधित किया.” ये डेरे अपने अनुयायियों को सम्मान, समानता और अपनापन प्रदान करने में सक्षम थे, जो प्रमुख मुख्यधारा का धर्म नहीं दे सकता था. राधा स्वामी, सच्चा सौदा, निरंकारी, नामधारी, हंडाली, दिव्य ज्योति जागरण संस्थान, भनियारावाला और रविदासिया सबसे लोकप्रिय डेरों या संप्रदायों में से हैं. इनमें से कुछ डेरे जैसे सच्चा सौदा, निरंकारी और भनियारावाला को रूढ़िवादी सिख  दूसरों की तुलना में कहीं ज्यादा नकारते हैं.

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आकर्षक विकल्प बन गए डेरे
प्रसिद्ध विद्वान डॉ. दर्शन सिंह ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “सच्चा सौदा जैसे डेरे 60 के दशक के अंत और 70 के दशक की शुरुआत में तब सुर्खियों में आए जब एसजीपीसी जैसी सिख संस्थाएं लोगों खासकर सिख जातियों और हाशिये पर रहने वाले लोगों की समस्याओं का समाधान करने में विफल रहीं.” इन शक्तिशाली डेरों में से कुछ के कार्यालय पंजाब के हर जिले में हैं. यहां तक कि भारत और विदेशों में भी थे. उन्होंने न केवल रूढ़िवादी सिख धर्म के एकाधिकार को चुनौती दी, बल्कि विभाजन के बाद के पंजाब में राजनीतिक और आर्थिक हित भी हासिल किए. जब आम लोग मुश्किल समय में सहारे की तलाश करते हैं और पारंपरिक उपदेशक उनसे संतोषजनक ढंग से संवाद करने में असफल होते हैं, तो विकल्प आकर्षक लगने लगते हैं. 

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संतों की संख्या में भी बढ़ोतरी
एक अध्ययन के अनुसार पंजाब के 12,000 गांवों में 9,000 से अधिक सिख और गैर-सिख डेरे थे. गैर-सिख डेरों में एक जीवित देवता की पूजा करना कोई गलत काम नहीं है. इनमें से कई की अपनी पवित्र पुस्तकें हैं और उनके अपने विवरण हैं कि दुनिया कैसे अस्तित्व में आयी. ऐसे समय में जब निवारण के पारंपरिक तरीके भ्रष्ट या पहुंच से बाहर माने जाते हैं, पूज्य बाबा की भूमिका आध्यात्मिक मार्गदर्शन से आगे बढ़कर अपने अनुयायियों के लिए व्यावहारिक सहायता (उदाहरण के लिए रियायती राशन और चिकित्सा देखभाल के रूप में) तक पहुंच गयी है. इसके साथ ही सच्चा सौदा के राम रहीम और नूरमहल स्थित दिव्य ज्योति जागरण संस्थान के बाबा आशुतोष महाराज (जब तक उन्हें चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित नहीं कर दिया गया) जैसे संतों की संख्या में भी वृद्धि हुई है. 

कुछ डेरों पर एक नजर डालते हैं:

डेरा सच्चा सौदा: हालांकि यह डेरा हरियाणा के सिरसा में स्थित है, लेकिन पंजाब में इसके अनुयायियों की एक बड़ी संख्या है. इसकी स्थापना 1948 में शाह मस्ताना जी ने की थी. वर्तमान में इसके प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह हैं. डेरा सच्चा सौदा अपने आध्यात्मिक उपदेशों, सामुदायिक सेवा और सामाजिक अभियानों के लिए जाना जाता है, जिनमें रक्तदान शिविर और स्वच्छता अभियान शामिल हैं.

डेरा सचखंड बल्लान: ये रविदासी डेरे हैं और सिख धर्म अपनाने वाली निचली जातियों के बीच इनका काफी प्रभाव है. इनमें प्रमुख हैं डेरा सचखंड बल्लान (जालंधर के पास) और डेरा चक हाकिम (पठानकोट के पास). ये डेरे 14वीं शताब्दी के कवि और गुरु रविदास की शिक्षाओं का पालन करते हैं, जो एक निचली जाति से थे.

संत निरंकारी मिशन: कई मुख्यधारा के सिखों द्वारा एक विधर्मी पंथ के रूप में देखे जाने वाले निरंकारी मिशन की स्थापना बाबा बूटा सिंह ने की थी. वह निरंकारी आंदोलन के सदस्य थे. निरंकारी एक धर्मनिरपेक्ष, आध्यात्मिक संप्रदाय होने का दावा करते हैं, जो किसी भी धर्म से संबद्ध नहीं है. वह इस बात से इनकार करते हैं कि सिखों का उन पर कोई अधिकार है.

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बाबा आशुतोष महाराज: दिव्य ज्योति जागृति संस्थान (डीजेजेएस) के संस्थापक जो एक गैर-लाभकारी आध्यात्मिक संगठन है, आशुतोष महाराज का जन्म महेश कुमार झा के रूप में 1946 में बिहार के मधुबनी जिले में हुआ था. 29 जनवरी, 2014 को आशुतोष महाराज को दिल का दौरा पड़ा और डॉक्टरों की एक टीम ने उन्हें चिकित्सकीय रूप से मृत घोषित कर दिया. हालांकि उनके अनुयायी उन्हें ‘आध्यात्मिक रूप से जीवित’ या गहन ध्यान की अवस्था में मानते हैं और उनके शरीर को एक फ्रीजर में संरक्षित किया है, जिसे वे उनकी समाधि कहते हैं. डीजेजेएस के पंजाब में 36 और अन्य जगहों पर 109 केंद्र हैं जिनमें कुछ विदेश में भी हैं.

बाबा प्यारा सिंह भनियारा: रोपड़ जिले में 1990 में स्थापित भनियारावाला डेरा के संस्थापक भनियारा पंजाब बागवानी विभाग के एक रेशम उत्पादन फार्म में एक निम्न स्तर के कर्मचारी थे. उन्होंने आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध गुरु होने का दावा किया और 20,000 से 6,00,000 के बीच की संख्या में बड़ी संख्या में अनुयायी जुटाए. उनके अनुयायी, जिनमें से अधिकांश दलित हैं उन्हें एक ‘चमत्कारी उपचारक’ मानते हैं. 

डेरा बाबा नानक: यह डेरा पंजाब के गुरदासपुर जिले में स्थित है और सिख धर्म के पहले गुरु, गुरु नानक देव जी से जुड़ा हुआ है. यह एक ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है, जो रावी नदी के किनारे स्थित है. यहां सिख समुदाय के लोग बड़ी संख्या में आते हैं.

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डेरा राधा स्वामी सत्संग : यह डेरा पंजाब के ब्यास शहर में स्थित है. इसकी स्थापना 1891 में बाबा जयमल सिंह ने की थी. यह डेरा अपने शांत और सुनियोजित वातावरण के लिए जाना जाता है. यहां सत्संग और आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है और इसके अनुयायी दुनिया भर में फैले हुए हैं. यह डेरा अपने विशाल कृषि फार्म और सामुदायिक रसोई (लंगर) के लिए भी प्रसिद्ध है, जहां एक साथ हजारों लोगों को भोजन परोसा जाता है।

 डेरा बाबा भल्लेशाह: यह डेरा सूफी संत बाबा भल्लेशाह से संबंधित है. यह पंजाब के तरनतारन जिले में स्थित है. यह डेरा सूफी संगीत और भाईचारे की भावना के लिए जाना जाता है. यहां हर साल उर्स (उत्सव) का आयोजन किया जाता है, जिसमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल होते हैं.

डेरा बाबा फरीद : यह डेरा सूफी संत बाबा फरीद से जुड़ा हुआ है. यह पंजाब के फरीदकोट शहर में स्थित है. बाबा फरीद की शिक्षाएं सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं. यह डेरा धार्मिक सहिष्णुता और प्रेम का प्रतीक है और यहां हर साल उनके जन्मोत्सव के दौरान एक बड़ा मेला लगता है.

ये डेरे पंजाब की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इन डेरों का प्रभाव केवल धार्मिक शिक्षा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर भी अपनी भूमिका निभाते हैं.



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