Tuesday, July 21, 2026
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मानसून में अपने आप उगती है ये जंगली सब्जी, स्वाद में चिनक-मटन को करती है फेल


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Kutumba Sabji Recipe: कोडरमा में मानसून के बाद उगने वाली कुटुंबा सब्जी बहुत ही ज्यादा पसंद की जाती है. इसे झारखंड में टर्की बेरी भी कहते हैं, ग्रामीण इलाकों में यह सब्जी बहुत ही लोकप्रिय है. यह पौष्टिक और औषधीय गुणों से भरपूर है, जिसे लोग पारंपरिक तरीके से बनाते हैं. आइये जानते हैं इसकी रेसिपी के बारे में.

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कोडरमा: झारखंड में कोडरमा जिले के ग्रामीण इलाकों में मानसून के मौसम के बाद झाड़ियों में अपने आप उगने वाली कुटुंबा इन दिनों लोगों की थाली की खास सब्जी बनी हुई है. इसे कई जगहों पर टर्की बेरी, जंगली बैंगन भी कहा जाता है. स्वाद में हल्की कड़वाहट होने के बावजूद यह अपने पौष्टिक और औषधीय गुणों के कारण ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों के बीच बेहद लोकप्रिय है. वर्षों से लोग इसे पारंपरिक तरीके से बनाकर अपने भोजन का हिस्सा बनाते आ रहे हैं. कुटुंबा प्राकृतिक रूप से उगने वाली जंगली सब्जी है. जिसके लिए किसी विशेष खेती की आवश्यकता नहीं होती है. मानसून के बाद खेतों के किनारों, झाड़ियों और खाली जमीन पर इसकी झाड़ियां दिखाई देने लगती हैं. इसकी झाड़ी बैंगन के पौधे की तरह पत्ते और कांटे वाली होती है.

ऐसे तैयार होता है कुटुंबा की भुजिया

वहीं, ग्रामीण महिलाएं इसे तोड़कर घर लाती हैं और इसकी भुजिया तैयार करती हैं. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह सब्जी शरीर को पोषण देने के साथ-साथ कई स्वास्थ्य लाभ भी पहुंचाती है. बहुमणि बिरहोर ने बताया कि इसकी भुजिया बनाने की विधि भी काफी आसान है. सबसे पहले कुटुंबा को अच्छी तरह धोकर उसकी डंडियों से अलग किया जाता है. इसके बाद हर दाने को बीच से दो भागों में काट लिया जाता है.

जहां स्वाद और मात्रा बढ़ाने के लिए इसमें बारीक कटे हुए आलू भी मिलाए जाते हैं. फिर कड़ाही में सरसों का तेल गरम कर उसमें साबुत जीरा, बारीक कटा लहसुन और प्याज डालकर सुनहरा होने तक भुना जाता है. इसके बाद कटे हुए कुटुंबा और आलू डालकर हल्दी, जीरा पाउडर, लाल मिर्च पाउडर और स्वादानुसार नमक मिलाया जाता है. धीमी आंच पर ढककर पकाने के बाद जब यह कुरकुरी हो जाती है तो इसकी खुशबू और स्वाद दोनों ही लोगों को खूब पसंद आते हैं.

मानसून के बाद बढ़ जाती है मांग

कोडरमा के आदिवासी समाज में इस सब्जी का विशेष महत्व है. मानसून के मौसम में कोडरमा के गांवों में कुटुंबा की मांग बढ़ जाती है. कई ग्रामीण परिवार इसे अपने उपयोग के साथ-साथ स्थानीय हाट-बाजारों में भी बेचते हैं. प्राकृतिक रूप से उपलब्ध यह जंगली सब्जी आज भी झारखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति और आदिवासी जीवनशैली की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी हुई है.

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Brijendra Pratap Singh

बृजेंद्र प्रताप सिंह डिजिटल-टीवी मीडिया में (2021) लगभग 5 सालों से सक्रिय हैं. मेट्रो न्यूज 24 टीवी चैनल मुंबई, ईटीवी भारत डेस्क, दैनिक भास्कर डिजिटल डेस्क के अनुभव के साथ 14 मई 2024 से  Hindi.News18.com  में स…और पढ़ें





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