Tuesday, July 21, 2026
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Crude Oil Price : फिर उबला कच्‍चा तेल, 90 डॉलर के पार निकला भाव


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Fuel price : मिडिल-ईस्‍ट में चल रही जंग ने पूरी दुनिया की सांसे अटका दी है. दुनिया के अहम समुद्री मार्ग होर्मुज फिर बंद हो गया है. इससे कच्‍चे तेल की सप्‍लाई बड़ी मात्रा में रुक गई है. इसका असर कच्‍चे तेल की कीमतों पर पड़ा है और ब्रेंट क्रूड एक बार फिर से 90 डॉलर को क्रॉस कर गया है.

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कच्‍चे तेल की कीमत आज फिर करीब तीन फीसदी उछल गई है.

नई दिल्‍ली. अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग ने तेल बाजार में उबाल ला दिया है. दोनों के बीच युद्धविराम टूटने के बाद होर्मुज जलडमरूमध्‍य फिर बंद हो गया है. इससे दुनिया में तेल की सप्‍लाई पर बुरा असर होगा. इसी चिंता से नए कारोबारी हफ्ते के पहले ही दिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड का भाव 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया. अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम होने पर यह टूटकर 71 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था. कच्‍चे तेल के रेट में रोज हो रही इस वृद्धि ने एक बार फिर से पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका का को जन्‍म दे दिया है.

ब्रेंट क्रूड आज 2.70 फीसदी उछलकर 90.52 डॉलर प्रति डॉलर हो गया है. इसी तरह अमेरिकी कच्‍चा तेल (WTI) 2.27 फीसदी चढ़कर 84.37 डॉलर प्रति बैरल हो गया है. पिछले हफ्ते जो डब्ल्यूटीआई (WTI) क्रूड 72 डॉलर पर था. खाड़ी क्षेत्र में शांति की फिलहाल कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही है. अमेरिका की बड़ी सैन्‍य तैयारियों से निवेशकों के लग रहा है यह जंग लंबा खिंचेगी. यही वजह है कि तेल कारोबारी किसी भी जोखिम से बचने के लिए महंगे दामों पर क्रूड ऑयल खरीदने को मजबूर हैं.

क्‍या होगा आगे?

विश्‍लेषकों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में शांति नहीं होती और समुद्री रास्‍ते सुरक्षित नहीं होते, तब तक कच्‍चे तेल के तेवर ठंडे पड़ने की उम्‍मीद कम ही है. होर्मुज का लंबे समय तक बंद रहना और अमेरिका ईरान के बीच जंग का लंबा खिंचना कच्‍चे तेल को और भड़का सकता है.

महंगाई बढने का खतरा

कच्‍चे तेल की कीमत बढ़ने से सरकारों और तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के रेट बढ़ाने होंगे. इससे सामान की ढुलाई से लेकर कंपनियों की उत्पादन लागत तक सब बढ़ जाएगा. कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहीं, तो दुनिया भर में महंगाई पर काबू पाना बहुत मुश्किल हो जाएगा. ट्रांसपोर्ट महंगा होने से खाने-पीने की चीजें और रोजमर्रा का सामान महंगा होने लगेगा. इसे रोकने के लिए बैंकों को अपनी ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ेंगी.  इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार और सुस्त हो सकती है.



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