Justice Yashwant Varma Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने के लिए विपक्षी सांसदों द्वारा लाए गए प्रस्ताव को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है. राज्यसभा के महासचिव पीसी मोदी ने इस प्रस्ताव में कई गंभीर कानूनी, प्रक्रियागत और तथ्यात्मक खामियों की ओर इशारा करते हुए इसे नॉट इन ऑर्डर यानी नियमों के अनुरूप नहीं बताया है. उनके मुताबिक, इतना गंभीर मामला होने के बावजूद प्रस्ताव को लापरवाही और जल्दबाजी में तैयार किया गया, जिससे यह प्रस्ताव अस्तित्वहीन (नॉन-एस्ट) माना गया. राज्यसभा सचिवालय की यह राय 11 अगस्त 2025 को राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश को सौंपी गई थी. इसी दिन लोकसभा के महासचिव उत्पल कुमार सिंह को भी औपचारिक रूप से सूचित किया गया कि राज्यसभा में लाया गया यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया गया है. यह पत्राचार अब सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड का हिस्सा है और पूरे मामले में अहम भूमिका निभा रहा है. पार्लियामेंट की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील रखी.
इस मुद्दे की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है, क्योंकि लोकसभा सचिवालय ने स्पीकर के फैसले का बचाव किया है. लोकसभा स्पीकर ने 12 अगस्त 2025 को जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया को आगे बढ़ाने और जांच समिति गठित करने का फैसला किया था. लोकसभा सचिवालय का कहना है कि उस समय राज्यसभा में कोई वैध प्रस्ताव मौजूद नहीं था, इसलिए स्पीकर को कार्रवाई का पूरा अधिकार था. इस फैसले को जस्टिस यशवंत वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. उन्होंने लोकसभा स्पीकर के प्रस्ताव स्वीकार करने और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत जांच समिति गठित करने के निर्णय पर सवाल उठाया है. इस याचिका पर सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार 8 जनवरी 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है.
प्रस्ताव में क्या थीं खामियां?
‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, राज्यसभा महासचिव पीसी मोदी ने अपनी विस्तृत राय में माना कि विपक्षी सांसदों का प्रस्ताव संख्या के लिहाज से सही था. इस प्रस्ताव पर 63 राज्यसभा सांसदों के हस्ताक्षर थे, जो न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(1)(b) के तहत आवश्यक संख्या को पूरा करते हैं. लेकिन इसके बावजूद, उन्होंने कहा कि प्रस्ताव में कई गंभीर विसंगतियां थीं, जो इसकी स्वीकार्यता की जड़ पर चोट करती हैं. सबसे बड़ी खामी कानून के गलत इस्तेमाल को बताया गया. प्रस्ताव में यह कहा गया था कि इसे सदन में स्वीकार किया जाए, जबकि कानून के मुताबिक प्रस्ताव स्वीकार करने का अधिकार संसद को सामूहिक रूप से नहीं, बल्कि स्पीकर या चेयरमैन को होता है. महासचिव ने कहा कि इतने गंभीर संवैधानिक पद से जुड़े मामले में गलत कानूनी प्रावधान का हवाला देना बेहद लापरवाह रवैये को दर्शाता है.
डेट भी सही नहीं लिख पाए
पीसी मोदी ने यह भी कहा कि प्रस्ताव में जिन दस्तावेजों और तथ्यों का उल्लेख किया गया, उनकी प्रमाणित प्रतियां संलग्न नहीं की गई थीं. उदाहरण के तौर पर प्रस्ताव में जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर नकदी मिलने से जुड़ी इन-हाउस कमेटी की रिपोर्ट का जिक्र किया गया, लेकिन उसकी प्रमाणिक प्रति चेयरमैन के सामने पेश नहीं की गई. इसके अलावा, प्रस्ताव में कुछ तथ्यात्मक गलतियां भी पाई गईं. प्रस्ताव में दावा किया गया था कि जस्टिस वर्मा के आवास का निरीक्षण 3 मार्च 2025 को हुआ, जबकि आग की घटना 14 मार्च 2025 की रात को हुई थी. इस तरह की तारीखों में विरोधाभास के कारण तथ्यों की सत्यता पर सवाल खड़े होते हैं. महासचिव के अनुसार, ये कमियां छोटी या तकनीकी नहीं हैं, बल्कि महाभियोग जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में प्रक्रियागत सुरक्षा सर्वोपरि होती है.
हाउस की संपत्ति कब बनता है प्रस्ताव?
पीसी मोदी की राय में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल भी उठाया गया है, जो अब सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है. सवाल यह है कि क्या कोई प्रस्ताव केवल पेश किए जाने भर से सदन की संपत्ति बन जाता है? महासचिव ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम की धारा 3 और 4 के बीच फर्क बताते हुए कहा कि संसद की भूमिका तब शुरू होती है, जब जांच समिति अपनी रिपोर्ट सौंप देती है. प्रस्ताव को स्वीकार करना स्पीकर या चेयरमैन का एक प्रशासनिक कार्य है, जिसका उद्देश्य यह देखना होता है कि प्रस्ताव कानून और प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं. यदि इसे सदन की सामूहिक संपत्ति मान लिया जाए, तो स्पीकर या चेयरमैन की भूमिका ही निरर्थक हो जाएगी.
उपसभापति का फैसला और लोकसभा को सूचना
महासचिव की राय पर विचार करने के बाद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी इससे सहमति जताई. उन्होंने दर्ज किया कि प्रस्ताव नियमों के अनुरूप नहीं है और इसलिए इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता. इसके बाद पी.सी. मोदी ने 11 अगस्त 2025 को लोकसभा महासचिव को पत्र लिखकर यह जानकारी दी कि राज्यसभा में लाया गया प्रस्ताव खारिज कर दिया गया है और वह “नॉन-एस्ट” माना गया है. इस पत्र में भी वही खामियां दोहराई गईं – गलत ड्राफ्टिंग, सहायक दस्तावेजों की कमी, गलत कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल और तथ्यात्मक विसंगतियां.
लोकसभा की दलील और जज वर्मा का पक्ष
ये सभी पत्राचार अब सुप्रीम कोर्ट में लोकसभा स्पीकर के बचाव का आधार बने हैं. लोकसभा सचिवालय का कहना है कि चूंकि राज्यसभा का प्रस्ताव कभी स्वीकार ही नहीं हुआ, इसलिए स्पीकर को 12 अगस्त को लोकसभा का प्रस्ताव स्वीकार करने और तीन सदस्यीय जांच समिति बनाने का अधिकार था. दूसरी ओर जस्टिस यशवंत वर्मा का तर्क है कि 21 जुलाई 2025 को दोनों सदनों में प्रस्ताव पेश किए गए थे. ऐसे में अधिनियम की धारा 3(2) के प्रावधान के अनुसार स्पीकर और चेयरमैन को मिलकर संयुक्त समिति बनानी चाहिए थी, जो नहीं की गई.
सुनवाई के दौरान क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं. पीठ ने कहा कि अदालत को एक ओर उस न्यायाधीश के अधिकारों की रक्षा करनी है, जिसके खिलाफ कार्रवाई हो रही है, और दूसरी ओर जनप्रतिनिधियों की इच्छा का भी सम्मान करना है. सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संसद की ओर से दलील दी कि राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज होने को किसी भी सांसद ने चुनौती नहीं दी है. यहां तक कि जस्टिस वर्मा ने भी इसे चुनौती नहीं दी, क्योंकि यह फैसला उनके पक्ष में था. उन्होंने कहा कि इस स्तर पर हस्तक्षेप करने से संवैधानिक जवाबदेही की प्रक्रिया बाधित होगी.

