सरकार ने विपक्ष के साथ मिलकर तय किया है कि ऑपरेशन सिंदूर की रणनीति, सफलता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया पर संसद में व्यापक चर्चा हो. इसके लिए लोकसभा में 16 घंटे और राज्यसभा में 9 घंटे का वक्त तय किया गया है. लेकिन चर्चा कब होगी, यह साफ नहीं हुआ, जिससे विपक्ष को संदेह है कि सरकार अपना एजेंडा पास कर बहस टाल सकती है. कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की मांग है कि यह बहस प्रधानमंत्री की उपस्थिति में ही हो, क्योंकि विदेश नीति, रक्षा और कूटनीतिक कार्रवाई से जुड़े निर्णय शीर्ष स्तर पर लिए जाते हैं.
सरकार इस बात पर जोर दे रही है कि ऑपरेशन सिंदूर पर रक्षा मंत्री राजनाथ जवाब दें, क्योंकि यह एक आर्मी ऑपरेशन था. 2020 में भारत-चीन सीमा पर गलवान घाटी में हुई झड़पों के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने संसद को संबोधित करके एक मिसाल कायम की थी. इसी तरह, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया था, लेकिन आधिकारिक बयान राजनाथ सिंह ने संसद में दिया था.
पीएम की मौजूदगी पर इतना जोर क्यों?
विपक्ष का कहना है कि प्रधानमंत्री जब खुद बयान देंगे, तब जिम्मेदारी तय होगी और बहस सार्थक होगी. कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पीएम 2 दिन बाद विदेश यात्रा पर जा सकते हैं, ऐसे में यह मांग है कि बहस कल ही हो. राहुल गांधी ने तो यहां तक कहा, मैं नेता प्रतिपक्ष हूं, लेकिन मुझे बोलने नहीं दिया जा रहा, सरकार के मंत्री बोल सकते हैं तो हमें भी मौका मिलना चाहिए. प्रियंका गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने भी सरकार से मांग की कि प्रधानमंत्री खुद जवाब दें. आतंकियों का क्या हुआ? पहलगाम हमले के बाद अब तक क्या कार्रवाई हुई? क्या अमेरिका के दबाव में युद्धविराम हुआ?
पहले क्या होता रहा है?
ऐसा पहली बार नहीं है कि प्रधानमंत्री किसी बहस के दौरान संसद में नहीं रहे. अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह और यहां तक कि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में भी कई बार अहम बहसें हुईं, जिनमें प्रधानमंत्री मौजूद नहीं रहे. सरकार की ओर से अन्य वरिष्ठ मंत्री जवाब देते रहे.
ऐतिहासिक उदाहरण देखने चाहिए
- 1971, 1972, 1982 जैसे वर्षों में जब संसद सत्र चल रहा था, इंदिरा गांधी ने कई राजनयिक दौरे किए. उस समय उनके विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री या अन्य वरिष्ठ मंत्री संसद में जवाबदेही निभाते थे.
- 1987 का बोफोर्स घोटाला-राजीव गांधी की संसद में उपस्थिति की मांग की गई. उनसे स्पष्टीकरण मांगा जाता रहा. इसकी वजह से पूरा मानसून सत्र बार-बार स्थगित होता रहा, क्योंकि प्रधानमंत्री जवाब नहीं दे रहे थे.
- 2001 में संसद हमले के बाद तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने बहस की शुरुआत नहीं की थी, बल्कि रक्षा मंत्री और गृह मंत्री ने जवाब दिया.
- 2008 के मुंबई हमलों के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कुछ ही बार संसद में बोले, अधिकतर जवाब गृह मंत्री और विदेश मंत्री ने दिए. कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले के वक्त भी विपक्ष ने यही सवाल उठाया, जवाब की मांग की.
- यानी परंपरा यह रही है कि सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री जवाब दे सकता है, जरूरी नहीं कि हर बार प्रधानमंत्री ही सामने आएं.
सरकार क्या कह रही है?
विपक्ष के सवाल
क्या प्रधानमंत्री की मौजूदगी अनिवार्य?
नहीं, संविधान, संसदीय परंपराएं और नियम यही कहते हैं कि सरकार का कोई भी वरिष्ठ मंत्री संसद में जवाब देने के लिए अधिकृत होता है. लेकिन विपक्ष की यह राजनीतिक रणनीति है कि हर अहम मुद्दे पर प्रधानमंत्री को घेरकर नैरेटिव तैयार किया जाए. यह लोकतंत्र का हिस्सा है कि विपक्ष सवाल पूछे, लेकिन अगर हर सवाल पर संसद ठप कर दी जाए, तो क्या इससे जनता को लाभ होगा? यदि सरकार चर्चा की तारीखा घोषित कर देती है और स्पष्ट करती है कि पीएम कब बोलेंगे, तो गतिरोध कुछ हद तक खत्म हो सकता है. लेकिन यदि यह टकराव जारी रहा, तो मॉनसून सत्र का बड़ा हिस्सा इसी खींचतान में निकल सकता है. यह साफ है कि दोनों पक्ष जनता को संदेश देना चाहते हैं कि सरकार अपनी सैन्य ताकत और कूटनीति को सफल बता रही है, तो विपक्ष सवालों की बौछार कर यह जताना चाहता है कि जवाबदेही केवल चुनाव जीतने से नहीं, बहस में खड़े होकर जवाब देने से तय होती है.

