तेजस्वी यादव की राजनीति और लालू परिवार की दरार
लालू प्रसाद की छोटी बेटी रोहिणी आचार्य का सार्वजनिक रूप से राजनीति छोड़ने और परिवार से रिश्ता तोड़ने की घोषणा किसी सामान्य भावनात्मक उफान का नतीजा नहीं कहा जा सकता. बीमार पिता को किडनी दान करने वाली बेटी का यह कदम तभी उठता है जब शिकायतें वर्षों से भीतर धधक रही हों. रोहिणी आचार्य ने आरोप लगाए कि तेजस्वी यादव के करीबी उन्हें लगातार अपमानित और प्रताड़ित करते रहे. यह बात जरूर सोचने पर मजबूर करती है कि जिस परिवार को लालू ने राजनीतिक विरासत की मजबूत दीवार बनाया, उसकी नींव भीतर ही भीतर दरक रही थी और तेजस्वी इस दरकन से या तो अनजान रहे या जानकर भी अनदेखा करते रहे.
लालू परिवार में विवाद, रोहिणी आचार्य ने तेजस्वी यादव पर गंभीर आरोप लगाए हैं और वह घर (मायका) छोड़कर चली गई हैं.
आरजेडी की हार, परिवार में बिखराव, तेजस्वी पर सवाल
क्या तेजस्वी यादव का दोहरा चरित्र बेनकाब हुआ?
पूरे चुनाव अभियान के दौरान तेजस्वी यादव ‘माई बहन मान योजना’ के नाम पर बिहार की महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा का वादा करते रहे, लेकिन उनकी अपनी बहनें ही सार्वजनिक अपमान और आंसुओं से गुजरें तो यह विरोधाभास आंखों पर पट्टी बांधकर भी दिखाई देता है. कहा जाता है कि एक नेता की असली परीक्षा उसके घर से शुरू होती है. यदि वह अपने घर में विश्वास बनाए रखने में असफल है तो करोड़ों मतदाताओं के भरोसे की जिम्मेदारी वह कैसे निभा सकता है?

तेजस्वी यादव, आरजेडी और लालू परिवार में पारिवारिक विवाद, बहनों के आरोपों के बीच नेतृत्व क्षमता पर सवाल. बिहार चुनाव हार के बाद नया संकट. रोहिणी आचर्य ने जिस रमीज का जिक्र किया है, उस पर हत्या का बड़ा आरोप लगा है.
क्या तेजस्वी नेतृत्व का दबाव नहीं संभाल पाए?
राजनीति में नैतिकता अक्सर भाषणों की चादर ओढ़ लेती है, मगर पारिवारिक घटनाएं उस चादर को पल भर में फाड़कर वास्तविकता को सामने रख देती हैं. तेजस्वी यादव की भूमिका इस पूरे विवाद में संदिग्ध इसलिए भी लगती है, क्योंकि अभी तक उन्होंने न तो बहनों के आरोपों पर खुलकर सफाई दी है और न ही परिवार की टूटती कड़ियों को जोड़ने का कोई कदम सार्वजनिक रूप से दिखाया है. ऐसे में सवाल यह कि क्या तेजस्वी यादव अपनी राजनीति की चमक में अपने ही परिवार के अंधेरे को छिपाए बैठे थे?
‘माई-बहन’ बाहर, बहन का अपमान घर के अंदर!
दरअसल, बिहार की राजनीति में तेजस्वी एक बड़े चेहरे के रूप में उभरना चाहते हैं, परंतु आज की स्थिति यह कहती है कि नेतृत्व का पहला पाठ-‘सम्मान’.. वही सबसे कठिन परीक्षा बन गया है. यदि परिवार ही नेतृत्व पर प्रश्नचिह्न लगाए तो जनता का विश्वास और भी कठिन हो जाता है. बिहार चुनाव में आरजेडी की हार तेजस्वी के खोखले वादों और दोहरे चरित्र की हार थी. जनता ने शायद पहले ही भांप लिया कि जो नेता अपनी बहन का सम्मान नहीं कर सकता, वह बिहार की बहनों का सम्मान क्या करेगा?

