Wednesday, May 20, 2026
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ना बिजली का बिल, ना AC की जरूरत… 50 डिग्री तापमान में भी ठंडे रहते हैं ये घर


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Summer Desi Tips: भीषण गर्मी और 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचते तापमान के बीच जहां शहरों में लोग एसी और कूलर के बिना परेशान हैं, वहीं गांवों में देसी जुगाड़ और पारंपरिक ज्ञान लोगों को राहत दे रहा है. ग्रामीण इलाकों में कच्चे छप्पर, मिट्टी की दीवारें और प्राकृतिक वेंटिलेशन वाली पारंपरिक निर्माण शैली आज भी घरों को ठंडा बनाए रखती हैं. स्थानीय लोग बताते हैं कि पुराने समय से अपनाए जा रहे ये देसी तरीके गर्म हवाओं को अंदर आने से रोकते हैं और घर का तापमान सामान्य बनाए रखते हैं. कई गांवों में लोग पेड़ों की छांव, मिट्टी के घड़ों का पानी और देसी निर्माण तकनीकों के जरिए बिना बिजली के भी आरामदायक जीवन जी रहे हैं.

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बाड़मेर. भीषण गर्मी ने आमजन का जीना मुश्किल कर दिया है. शहरों में एसी और कूलर भी जवाब देने लगे हैं लेकिन रेगिस्तान के कई गांवों में आज भी लोग पारंपरिक तरीके अपनाकर गर्मी से राहत पा रहे हैं. कच्चे छप्पर, मिट्टी की दीवारें, देशी पंखे (पान), देशी खानपान और घरों का पारंपरिक निर्माण उन्हें तपती गर्मी में भी सुकून दे रहा है.

जहां एक तरफ 50 डिग्री तापमान में लोग घरों से बाहर निकलने से बच रहे हैं वहीं रेगिस्तानी इलाकों में लोग आज भी कच्चे छप्पर और देसी पंखों के सहारे गर्मी को मात दे रहे हैं. मिट्टी के घर, खान पान और परंपरागत जीवनशैली उन्हें बिना एसी-कूलर भी राहत दे रही है. गांवों में कई घर ऐसे हैं जहां टीनशेड या सीमेंट की छत के बजाय घास-फूस, लकड़ी और मिट्टी से बने कच्चे छप्पर हैं. ये छप्पर दिनभर की तेज धूप को सीधे अंदर नहीं आने देते है जिससे घर के अंदर का तापमान बाहर की तुलना में काफी कम रहता है.

मिट्टी के घर रखते हैं ठंडक बरकरार
खडीन निवासी बुजुर्ग पन्नाराम बताते है कि मिट्टी की दीवारों में प्राकृतिक इंसुलेशन होता है. दिन में यह बाहरी गर्मी को काफी हद तक रोकती हैं और रात में ठंडक बनाए रखने में मदद करती हैं. यही वजह है कि कई बुजुर्ग आज भी पक्के मकानों की बजाय कच्चे घरों को गर्मी के मौसम में ज्यादा आरामदायक मानते हैं.

बदलती जीवनशैली में भी कायम परंपरा
गांवों में भी पक्के मकानों और आधुनिक उपकरणों का चलन बढ़ा है लेकिन भीषण गर्मी पड़ने पर लोग आज भी पुराने देसी तरीकों को ज्यादा कारगर मानते हैं. बुजुर्ग भैराराम बताते है कि कि “पहले एसी-कूलर नहीं थे फिर भी लोग इतनी गर्मी में आराम से रहते थे घर और रहन-सहन मौसम के हिसाब से बनाते थे.

पारंपरिक पहनावा भी है गर्मी से बचने का राज
इतना ही बाड़मेर जैसे रेगिस्तानी इलाको में सुबह जल्दी कामकाज निपटाकर घरों की ओर लौट रहे है. इसके अलावा  मटके का ठंडा पानी, छाछ-राबड़ी और दोपहर में कम आवाजाही जैसी आदतें भी लोगों को लू और गर्मी से बचाने में मदद कर रही हैं. बुजुर्ग रतनाराम सेजू बताते है कि पश्चिम राजस्थान में पारंपरिक पहनावा जैसे धोती-कुर्ता, तेवटा, साफा और सूती कपड़ा ज्यादा पहनते है जिससे गर्मी का असर कम रहता है.

पेड़ो की छांव और झोपडी की गोद में मिलता है सुकून
बाड़मेर निवासी रमेश कुमार गर्ग बताते है कि जहां शहरों में लोग 50 डिग्री तापमान से राहत पाने के लिए AC-कूलर का सहारा ले रहे हैं वहीं रेगिस्तान के गांवों में आज भी खेजड़ी,जाल की घनी छांव, खुले झोंपे और कच्चे छप्पर लोगों के लिए सुकून का ठिकाना बने हुए हैं. दोपहर की तपती धूप में ग्रामीण पेड़ों के नीचे बैठकर आराम करते हैं. वही झोपड़ी में आराम करने से लोगो को लू व गर्मी से राहत मिलती है.

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Jagriti Dubey

Hi, I am Jagriti Dubey, a media professional with 6 years of experience in social media and content creation. I started my career with an internship at Gbn 24 news channel in 2019 and have worked with many repu…और पढ़ें



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