Monday, June 1, 2026
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नमक की गुफाओं में रखता है अमेरिका अपना क्रूड, जानिए कहां है भारत की अभेद्य तेल तिजोरी


नई दिल्ली. दुनिया में जब भी कोई बड़ा युद्ध, भू राजनीतिक संकट या तेल सप्लाई पर खतरा मंडराता है, तो सबसे ज्यादा चिंता उन देशों को होती है जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करते हैं. भारत भी उन्हीं देशों में शामिल है, क्योंकि देश अपनी कुल जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है. ऐसे में अगर किसी वजह से तेल की सप्लाई रुक जाए या समुद्री मार्ग प्रभावित हो जाएं, तो देश की अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है. इसी खतरे को देखते हुए भारत ने जमीन के नीचे ऐसी विशाल तेल तिजोरियां तैयार की हैं, जो संकट के समय देश की ऊर्जा सुरक्षा की सबसे मजबूत ढाल बनती हैं. इन भूमिगत भंडारों को स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व (SPR) कहा जाता है. हाल के दिनों में पश्चिम एशिया संकट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच ये तेल भंडार एक बार फिर चर्चा में आ गए हैं.

स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व किसी देश द्वारा आपातकालीन परिस्थितियों के लिए जमा किया गया कच्चे तेल का विशेष भंडार होता है. इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई बाधित हो जाए, युद्ध छिड़ जाए, समुद्री रास्ते बंद हो जाएं या तेल की कीमतों में अचानक भारी उछाल आ जाए. दुनिया के कई बड़े देशों के पास ऐसे रणनीतिक भंडार हैं. अमेरिका, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए इस तरह के रिजर्व बनाकर रखते हैं.

अमेरिका की नमक की गुफाएं और भारत का चट्टानी किला

अमेरिका का स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व मुख्य रूप से टेक्सास और लुइजियाना में मौजूद विशाल प्राकृतिक नमक की गुफाओं यानी सॉल्ट केवर्न्स में रखा जाता है. नमक की परतें तेल को सुरक्षित रखने के लिए बेहद उपयुक्त मानी जाती हैं क्योंकि इनमें रिसाव का खतरा बहुत कम होता है और स्टोरेज लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है. भारत के पास ऐसी प्राकृतिक नमक गुफाएं उपलब्ध नहीं हैं. इसलिए भारतीय इंजीनियरों ने अलग रास्ता अपनाया. देश के दक्षिणी हिस्से की मजबूत ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर विशाल भूमिगत रॉक केवर्न्स तैयार किए गए. इन गुफाओं को अत्याधुनिक वाटर सीलिंग तकनीक से सुरक्षित बनाया गया है ताकि कच्चा तेल बाहर न निकल सके और लंबे समय तक सुरक्षित रहे.

कहां हैं भारत की तेल तिजोरियां?

भारत के पहले चरण के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व तीन प्रमुख स्थानों पर बनाए गए हैं.

विशाखापत्तनम (Visakhapatnam), आंध्र प्रदेश – 1.33 MMT
मैंगलोर (Mangaluru), कर्नाटक – 1.5 MMT
पाडुर (Padur), कर्नाटक – 2.5 MMT

इन तीनों की कुल क्षमता लगभग 5.33 मिलियन मीट्रिक टन है. इन स्थानों का चयन भी रणनीतिक रूप से किया गया है क्योंकि ये समुद्री बंदरगाहों के काफी करीब हैं. इससे आयातित कच्चे तेल को सीधे पाइपलाइन के जरिए भंडारों तक पहुंचाना आसान हो जाता है.

परमाणु हमला भी नहीं कर सकता बड़ा नुकसान

भारत की ये भूमिगत तेल तिजोरियां सामान्य तेल टैंकों से पूरी तरह अलग हैं. जमीन के सैकड़ों फीट नीचे होने के कारण ये हवाई हमलों, आतंकी हमलों, आगजनी और कई प्राकृतिक आपदाओं से काफी हद तक सुरक्षित मानी जाती हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक भूमिगत रॉक केवर्न्स में रखा गया तेल सतह पर मौजूद विशाल स्टोरेज टैंकों की तुलना में कहीं ज्यादा सुरक्षित रहता है. यही वजह है कि दुनिया के कई देश अब भूमिगत भंडारण को प्राथमिकता दे रहे हैं.

संकट में कितने दिन चलेगा भारत?

भारत के मौजूदा स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व में मौजूद तेल देश की लगभग 9.5 दिनों की जरूरत पूरी कर सकता है. हालांकि तस्वीर इससे कहीं बड़ी है. देश की सरकारी और निजी रिफाइनिंग कंपनियों के पास भी बड़ी मात्रा में कमर्शियल स्टॉक मौजूद रहता है. SPR और कमर्शियल स्टॉक को मिलाकर भारत के पास लगभग 74 दिनों तक की जरूरत पूरी करने लायक तेल भंडार उपलब्ध रहता है. यानी अगर किसी वजह से वैश्विक सप्लाई अचानक बाधित हो जाए, तब भी भारत के पास कुछ समय तक हालात संभालने का मजबूत बैकअप मौजूद है.

1991 के संकट से मिला था सबक

भारत में स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व की सोच अचानक नहीं आई. 1991 के खाड़ी युद्ध और उसके बाद पैदा हुए ऊर्जा संकट ने यह एहसास कराया कि आयातित तेल पर अत्यधिक निर्भरता देश के लिए बड़ा जोखिम बन सकती है. इसके बाद विभिन्न समितियों और ऊर्जा विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि भारत को भी अमेरिका और जापान की तरह रणनीतिक तेल भंडार तैयार करने चाहिए. इसी सोच ने आगे चलकर SPR परियोजना का रूप लिया.

अब शुरू हो रहा है दूसरा चरण

भारत अब स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व के दूसरे चरण पर भी तेजी से काम कर रहा है. इसके तहत दो नई परियोजनाएं प्रस्तावित हैं.

चंडीखोल (Chandikhol), ओडिशा – 4 MMT
पाडुर विस्तार (Padur Expansion), कर्नाटक – 2.5 MMT

इन दोनों परियोजनाओं के पूरा होने के बाद देश की कुल रणनीतिक भंडारण क्षमता में करीब 6.5 MMT की अतिरिक्त बढ़ोतरी होगी.

विदेशी कंपनियों को भी मिलेगी जगह

दूसरे चरण की एक बड़ी खासियत यह है कि इसे पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल के तहत विकसित किया जा रहा है. इसमें विदेशी तेल कंपनियों को भी भंडारण की सुविधा दी जाएगी. संयुक्त अरब अमीरात की तेल कंपनी एडीएनओसी (ADNOC) पहले ही भारत के रणनीतिक भंडारों में तेल स्टोर कर चुकी है. इससे भारत को दोहरा फायदा मिलता है. एक तरफ निवेश का बोझ कम होता है, वहीं दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त तेल तक पहुंच भी आसान हो जाती है.

क्यों अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?

भारत के आयातित कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है और उसकी सप्लाई का प्रमुख रास्ता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है. दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में शामिल यह रास्ता वैश्विक तेल व्यापार की लाइफलाइन माना जाता है. जब भी इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, भारत समेत कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं. ऐसे समय में जमीन के नीचे बनी ये विशाल तेल तिजोरियां देश के लिए सुरक्षा कवच का काम करती हैं. यही वजह है कि भारत की स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व व्यवस्था को सिर्फ तेल भंडारण परियोजना नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता से जुड़ा एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर माना जाता है.



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