Tuesday, June 30, 2026
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एक ग्राहक की उधारी ने बदल दी किस्मत, बन गए हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार


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हिंदी सिनेमा के दिग्गज संगीतकार कल्याणजी ने अपने भाई आनंदजी के साथ मिलकर भारतीय फिल्म संगीत को कई यादगार धुनें दीं. कहा जाता है कि रिकॉर्डिंग के दौरान अगर उन्हें किसी गाने में भावनाओं की कमी महसूस होती थी, तो वे तुरंत रिकॉर्डिंग रुकवा देते थे. एक बार उन्होंने गाने की एक लाइन सुनकर कहा था, ‘इस लाइन में दर्द कम लग रहा है, ये ऐसे नहीं चलेगा.’ फिर उन्होंने खुद गाकर बताया कि उस लाइन में कितना एहसास होना चाहिए. यही सोच उन्हें अपने दौर के सबसे अलग और बेहतरीन संगीतकारों में शामिल करती थी.

नई दिल्ली. 30 जून 1928 को गुजरात के कच्छ में जन्मे कल्याणजी का बचपन साधारण परिवार में बीता. बाद में उनका परिवार मुंबई आकर बस गया, जहां उनके पिता वीरजी शाह किराने की दुकान चलाते थे. बचपन से ही कल्याणजी का सपना संगीतकार बनने का था, लेकिन संगीत सीखने के लिए उनके पास संसाधन नहीं थे.

उनकी जिंदगी ने तब नया मोड़ लिया, जब उनके पिता की दुकान पर आने वाले एक ग्राहक ने उधारी चुकाने की बजाय कल्याणजी और उनके भाई आनंदजी को संगीत सिखाने की पेशकश की. यही छोटी-सी घटना आगे चलकर भारतीय संगीत के इतिहास का बड़ा अध्याय बन गई.

जब कल्याण जी और आनंद जी संगीत सीखने सीख चुके थे, तो दोनों भाइयों ने ‘कल्याणजी वीरजी एंड पार्टी’ नाम से ऑर्केस्ट्रा शुरू किया. मुंबई और दूसरे शहरों में उनके स्टेज शो लोकप्रिय होने लगे. धीरे-धीरे उन्हें फिल्मों में काम मिलने लगा. उनका फिल्मी सफर 1959 में रिलीज हुई ‘सम्राट चंद्रगुप्त’ से शुरू हुआ.

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इसी साल उन्होंने ‘सट्टा बाजार’ और ‘मदारी’ जैसी फिल्मों में भी संगीत दिया. लेकिन असली पहचान उन्हें 1960 में आई ‘छलिया’ से मिली. इस फिल्म का गाना ‘डम डम डिगा डिगा’ आज भी लोगों की जुबान पर है. इसके बाद ‘हिमालय की गोद में’ और ‘जब जब फूल खिले’ जैसी फिल्मों ने उन्हें सुपरहिट संगीतकारों की कतार में ला खड़ा किया.

इसके बाद उन्होंने ‘ये समा, समा है प्यार का’, ‘पल पल दिल के पास’, ‘यारी है ईमान मेरा’, ‘ओ साथी रे’, ‘कसमें वादे प्यार वफा’ और ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’ जैसे अनगिनत गाने आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं. 1967 में रिलीज हुई फिल्म ‘उपकार’ का देशभक्ति गीत ‘मेरे देश की धरती’ उनकी सबसे यादगार रचनाओं में गिना जाता है. इस गाने की रिकॉर्डिंग में काफी समय लगा था और इसमें लाइव साउंड का इस्तेमाल किया गया था, जिसने इसे और भी खास बना दिया.

बता दें कि 1970 का दशक कल्याणजी-आनंदजी के करियर का सबसे सुनहरा दौर रहा. ‘डॉन’, ‘कोरा कागज’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘सफर’ और ‘जंजीर’ जैसी फिल्मों के संगीत ने उन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया.कल्याणजी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह सिर्फ धुन नहीं बनाते थे, बल्कि हर शब्द और हर भावना को महसूस करते थे.

रिकॉर्डिंग के दौरान अगर उन्हें कहीं दर्द, खुशी या जज्बात की कमी लगती, तो वे कलाकारों को खुद समझाते थे कि गाना कैसे महसूस करके गाया जाए. कई गायकों ने माना कि उनके साथ काम करना किसी संगीत की पाठशाला से कम नहीं था.

कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने करीब 250 फिल्मों में संगीत दिया. उन्हें 1968 में फिल्म ‘सरस्वतीचंद्र’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. वहीं 1975 में ‘कोरा कागज’ के लिए फिल्मफेयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. साल 1992 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी नवाजा.24 अगस्त 2000 को कल्याणजी इस दुनिया को अलविदा कह गए. लेकिन उनकी बनाई धुनें और उनका संगीत आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में उसी तरह जिंदा है.

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