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दुकानदार राकेश बताते हैं कि मनरसा बनाने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती. सही अनुपात, धीमी आंच और वर्षों का अनुभव ही इसकी असली पहचान है. यही वजह है कि उनकी दुकान पर हर दिन बड़ी संख्या में ग्राहक पहुंचते हैं और कई लोग अपने रिश्तेदारों के लिए भी इसे पैक कराकर ले जाते हैं.
गौरव सिंह/भोजपुर: अगर आपने भोजपुर की मशहूर मनरसा मिठाई का स्वाद नहीं चखा है, तो समझिए आपने यहां की पारंपरिक मिठास का एक खास हिस्सा अभी तक आपने नहीं जाना. बाहर से हल्की कुरकुरी और अंदर से नरम और खोए की खुशबू से भरपूर मनरसा आज भी लोगों की पहली पसंद बनी हुई है. खास बात यह है कि यह मिठाई आधुनिक मशीनों से नहीं, बल्कि पारंपरिक तरीके से हाथों से तैयार की जाती है. आरा शहर में बड़ी मस्जिद के सामने हर शाम लगने वाली विनोद मनरसा की दुकान पूरे भोजपुर में अपनी खास पहचान रखती है.
विनोद की दुकान से रोजाना करीब 50 किलो मनरसा की बिक्री होती है. इसकी कीमत 320 रुपये प्रति किलो है. त्योहारों, शादी-विवाह और सावन जैसे धार्मिक अवसरों पर इसकी मांग और भी बढ़ जाती है. दूर-दूर से लोग सिर्फ इस मिठाई का स्वाद लेने यहां पहुंचते हैं.
बात करते हैं कि आखिर मनरसा बनता कैसे है. इसकी शुरुआत अच्छी गुणवत्ता वाले चावल से होती है. सबसे पहले चावल को अच्छी तरह साफ कर कई घंटों तक पानी में भिगोया जाता है. इसके बाद चावल को निकालकर सुखाया जाता है और फिर बारीक पीसकर उसका आटा तैयार किया जाता है. यही चावल का आटा मनरसा की मुख्य पहचान होता है.
दूसरी ओर ताजा खोआ (मावा) तैयार किया जाता है. इसमें स्वाद के अनुसार चीनी, खुशबू के लिए छोटी इलायची का पाउडर और जरूरत के अनुसार थोड़ा घी मिलाया जाता है. कई कारीगर स्वाद को और बेहतर बनाने के लिए इसमें हल्का-सा सूखा मेवा भी मिलाते हैं, हालांकि पारंपरिक मनरसा का असली स्वाद चावल और खोए के संतुलन से ही आता है. इसके बाद चावल के आटे और खोए के मिश्रण को अच्छी तरह गूंथकर छोटे-छोटे गोले या चपटी टिक्की का आकार दिया जाता है. फिर इन्हें धीमी आंच पर शुद्ध घी या रिफाइंड तेल में सुनहरा होने तक तला जाता है. तैयार होने के बाद इसकी खुशबू और स्वाद लोगों को अपनी ओर खींच लेता है.
दुकानदार राकेश बताते हैं कि मनरसा बनाने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती. सही अनुपात, धीमी आंच और वर्षों का अनुभव ही इसकी असली पहचान है. यही वजह है कि उनकी दुकान पर हर दिन बड़ी संख्या में ग्राहक पहुंचते हैं और कई लोग अपने रिश्तेदारों के लिए भी इसे पैक कराकर ले जाते हैं. बाजार में नई-नई मिठाइयों की भरमार के बावजूद मनरसा आज भी भोजपुर की पारंपरिक पहचान को जीवित रखे हुए है.
चावल, खोया और देसी कारीगरी से तैयार होने वाली यह मिठाई सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि भोजपुर की संस्कृति और विरासत की भी मिठास अपने साथ समेटे हुए है. जो भी एक बार इसका स्वाद चखता है, वह दोबारा इसे खाने जरूर लौटता है.
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