वैल्यू इन्वेस्टिंग के गुरु , शेयर मार्केट का उस्ताद और पैसा छापने की मशीन… वॉरेन बफेट को लोग कुछ ऐसे ही नामों से पुकारते हैं. बर्कशायर हैथवे की लगभग छह दशक तक कमान संभालने के बाद अब उन्होंने चेयरमैन का पद छोड़ दिया और अपने बेटे हावर्ड ग्राहम बफेट को 13 लाख करोड़ की यह कंपनी सौंप दी है.हावर्ड ग्राहम को लोग हावी या होवी बफेट के नाम से जानते हैं. 71 साल के हावर्ड अब दुनिया की सबसे बड़ी और सबसे सफल कंपनियों में से एक के चेयरमैन हैं. लेकिन वो अपने पिता की तरह रोज शेयर बाजार की चाल नहीं देखते. उनकी जिंदगी बिल्कुल अलग रही है. वो मार्केट एक्सपर्ट से ज्यादा किसान रहे हैं. उनकी कहानी बेहद दिलचस्प है.
हावर्ड ग्राहम बफेट का जन्म 16 दिसंबर 1954 को हुआ था. वो वॉरेन बफेट और उनकी पहली पत्नी सुसान थॉम्पसन बफेट के तीन बच्चों में से बीच वाले हैं. बड़ी बहन सुसी हैं और छोटे भाई पीटर. नाम रखा गया था दादा हावर्ड बफेट और वॉरेन के गुरु बेंजामिन ग्राहम के नाम पर.
हावर्ड ने तीन कॉलेज में पढ़ाई की. अगस्टाना कॉलेज, चैपमैन कॉलेज और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया इरविन से, लेकिन किसी से डिग्री नहीं ली. कॉलेज छोड़ने के बाद उन्होंने किसानी शुरू की. 1977 में उन्होंने नेब्रास्का में खेती शुरू की. पिता वॉरेन ने उनके लिए जमीन खरीदी और किराए पर दी. बाद में हावर्ड इलिनॉय चले गए. आज वो पाना, इलिनॉय में 1500 एकड़ के पारिवारिक फार्म की देखभाल करते हैं. उनके फाउंडेशन के रिसर्च फार्म एरिजोना और साउथ अफ्रीका में भी फैले हुए हैं.
पिता ने वजन कम करने की शर्त पर खेत किराए पर दिया
हावर्ड से जुड़ा एक किस्सा खूब मशहूर है. कहते हैं कि वॉरेन बफेट ने 1980 के दशक में नेब्रास्का में एक खेत खरीदा और बेटे हावर्ड को किराए पर दिया. लेकिन शर्त अनोखी थी. किराए का एक हिस्सा हावर्ड के वजन पर निर्भर करता था. अगर वजन ज्यादा होता तो किराया प्रतिशत बढ़ जाता. वॉरेन चाहते थे कि बेटा सेहत का ध्यान रखे. हावर्ड ने बाद में खुद इस बात को स्वीकार किया था कि पिता का यह तरीका थोड़ा अजीब जरूर था, लेकिन असरदार रहा.
तीन कॉलेज छोड़े, फिर भी शेरिफ बन गए
हावर्ड ने तीन अलग-अलग कॉलेज में दाखिला लिया, लेकिन किसी से ग्रेजुएट नहीं हुए. पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने खेती शुरू की. सालों बाद इलिनॉय के मेकन काउंटी में शेरिफ भी बने. यानी दुनिया के सबसे अमीर आदमी के बेटे ने बैज लगाकर कानून व्यवस्था का काम किया. कई लोगों को यकीन नहीं होता कि बफेट का बेटा शेरिफ भी रह चुका है.
एक अरब डॉलर से ज्यादा सिर्फ यूक्रेन को दिए
हावर्ड का फाउंडेशन सिर्फ नाम का परोपकार नहीं करता. रूस के हमले के बाद उन्होंने यूक्रेन में एक अरब डॉलर से ज्यादा की मदद पहुंचाई. प्रिंटिंग प्रेस बचाने से लेकर खाने-पीने और पुनर्निर्माण तक का काम किया. कई मौकों पर खुद वहां गए. बड़े-बड़े देशों की मदद से भी ज्यादा व्यक्तिगत स्तर पर काम किया.
150 से ज्यादा देशों की यात्रा, लेकिन सादा जीवन
हावर्ड 150 से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं. युद्ध क्षेत्र, जंगल, गरीब इलाके… सब जगह गए. फोटोग्राफी की, किताबें लिखीं. लेकिन निजी जीवन में काफी सादगी पसंद करते हैं. बड़े फार्महाउस या शानदार लाइफस्टाइल के चक्कर में नहीं रहे. इलिनॉय के अपने फार्म पर ही ज्यादा समय बिताना पसंद करते हैं.
’40 चांस’ का सिद्धांत
हावर्ड की एक मशहूर किताब है ’40 Chances’. इसमें उन्होंने लिखा कि किसान को एक फसल में सिर्फ 40 बार मौका मिलता है. इसी तरह जिंदगी में भी बड़े फैसले सीमित होते हैं. इसलिए हर मौके को गंभीरता से लेना चाहिए. ये सोच उनके परोपकार और खेती दोनों में दिखती है.
कंपनी बोर्डों का अनुभव
सिर्फ खेती और चैरिटी नहीं, हावर्ड कई बड़ी कंपनियों के बोर्ड में भी रहे. आर्चर डेनियल्स मिडलैंड, कोका-कोला, कोनाग्रा फूड्स, लिंडसे कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियों में डायरेक्टर रहे. कुछ में चेयरमैन भी बने. बर्कशायर हैथवे के बोर्ड में वो 1993 से हैं. यानी 33 साल. वॉरेन बफेट ने खुद कहा कि हावर्ड ने उनसे लंबा अप्रेंटिसशिप किया है.
अब क्या करेंगे चेयरमैन बनकर?
हावर्ड का काम दिन-प्रतिदिन कंपनी चलाना नहीं है. वो नॉन-एग्जिक्यूटिव चेयरमैन हैं. बर्कशायर के सीईओ ग्रेग एबल हैं, जिन्होंने जनवरी 2026 से कमान संभाली हुई है. वॉरेन बफेट ने साफ लिखा, ग्रेग कंपनी चलाएंगे. हावर्ड संस्कृति और मूल्यों की रक्षा करेंगे. ये दोनों चीजें बैलेंस शीट पर लिखी किसी भी चीज से ज्यादा कीमती हैं.
हावर्ड का काम बर्कशायर की उस संस्कृति को बचाना है, जिसमें कंपनियों को आजादी दी जाती है, मैनेजरों का सम्मान किया जाता है, शेयरधारकों से ईमानदारी बरती जाती है और अनावश्यक जटिलता से बचा जाता है. उन्होंने खुद कहा था, ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है. चीजों को सिंपल रखना है, जो जरूरी है वो करना है, लोगों के साथ फेयर रहना है.
वॉरेन बफेट का भरोसा
वॉरेन बफेट लंबे समय से कह रहे थे कि चेयरमैन का पद हावर्ड को ही मिलेगा. उनका मानना था कि बेटा कंपनी की आत्मा को समझता है. 2011 में ही उन्होंने संकेत दे दिया था. अब 96 साल की उम्र में उन्होंने आखिरकार यह कदम उठा लिया. वो बोर्ड में बने रहेंगे और सलाह देते रहेंगे, लेकिन मुख्य जिम्मेदारी अब बेटे के कंधों पर है.

