Thursday, October 8, 2026
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यूपीआई पर 0.4% चार्ज लगने से पहले आया बड़ा अपडेट, क्या जनवरी तक टल जाएगा नियम


15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से ज्यादा के UPI ट्रांजैक्शन पर 0.4% MDR लागू होना है. लेकिन अब मर्चेंट संगठनों, फिनटेक कंपनियों और पेमेंट इंडस्ट्री ने इसे कुछ समय के लिए टालने की मांग की है. इन कंपनियों और कारोबारियों का कहना है कि नए सिस्टम को लागू करने से पहले उन्हें तैयारी के लिए और समय चाहिए. खासकर अलग-अलग तरह के UPI पेमेंट पर अलग चार्ज तय होने से कई सवाल अभी साफ नहीं हैं.

मनीकंट्रोल की रिपोर्ट के अनुसार, सूत्रों ने जानकारी दी है कि NPCI के नियम को जनवरी 2027 तक टालने की मांग मिली है. इस मामले में वित्त मंत्रालय के साथ भी बातचीत चल रही है. NPCI अगले दो दिनों में इस पर फैसला ले सकता है. इंडस्ट्री चाहती है कि पहले त्यौहारी खरीदारी का सीजन निकल जाए और उसके बाद नई व्यवस्था लागू की जाए. कारोबारियों को डर है कि अगर इस समय अतिरिक्त लागत बढ़ी तो इसका असर बिक्री और ग्राहकों की खरीदारी पर पड़ सकता है. वहीं, सरकार भी ऐसे समय में नया खर्च बढ़ने को लेकर सतर्क है, जब महंगाई पहले से लोगों के बजट पर दबाव डाल रही है.

2,000 रुपये से ऊपर के पेमेंट पर कितना खर्च बढ़ेगा?

नए प्लान के तहत 2,000 रुपये से अधिक के UPI पेमेंट पर 0.4% MDR लगाया जाना है. यह पैसा सीधे ग्राहक से लिया जाएगा या दुकानदार इसकी भरपाई किसी दूसरे तरीके से करेगा, यह अलग मुद्दा है. MDR यानी Merchant Discount Rate वह फीस है जो डिजिटल पेमेंट स्वीकार करने वाले मर्चेंट के स्तर पर पेमेंट प्रोसेसिंग के लिए लगती है. छोटे कारोबारियों के लिए यह रकम अहम हो सकती है. जिन दुकानदारों का मुनाफा पहले से सीमित है, उनके लिए हर ट्रांजैक्शन पर अतिरिक्त लागत कमाई को प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि कई मर्चेंट संगठन फिलहाल नियम को रोकने की मांग कर रहे हैं.

असली परेशानी सिर्फ चार्ज नहीं, नियमों की जटिलता भी

पेमेंट इंडस्ट्री की सबसे बड़ी चिंता MDR की दर को लेकर है. अलग-अलग तरह के भुगतान के लिए अलग नियम बनाए गए हैं. यूटिलिटी बिल, लोन की किस्त और कैपिटल मार्केट से जुड़े पेमेंट एक जैसे नहीं माने जाते. इससे बैंक, पेमेंट एग्रीगेटर और मर्चेंट के लिए यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि किसी ट्रांजैक्शन पर कौन-सा चार्ज लागू होगा.

कार्ड पेमेंट में मर्चेंट कैटेगरी कोड के आधार पर ट्रांजैक्शन की पहचान करना अपेक्षाकृत आसान है. UPI में तस्वीर ज्यादा मुश्किल है. कई ऐसे भुगतान हैं जिन्हें ग्राहक कार्ड से कर भी नहीं सकते. इसलिए इंडस्ट्री का कहना है कि नई व्यवस्था लागू करने से पहले सिस्टम में इन सभी कैटेगरी की सही पहचान जरूरी है.

लोन पेमेंट में सामने आई बड़ी उलझन

लोन की किस्त का उदाहरण इस समस्या को अच्छी तरह समझाता है. कुछ ऑटोपे ट्रांजैक्शन खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं होने के कारण फेल हो जाते हैं. इसके बाद ग्राहक अगर खुद भुगतान करता है तो सिस्टम के स्तर पर उसे अलग तरह के ट्रांजैक्शन के रूप में देखा जा सकता है. NPCI के निर्देशों में कुछ ऑटोपे आधारित लोन पेमेंट के लिए 5 रुपये की फ्लैट फीस का प्रावधान है. लेकिन मैन्युअल रिपेमेंट को लेकर बैंक और पेमेंट कंपनियों के बीच कैटेगरी तय करने में भ्रम की स्थिति बताई जा रही है. सवाल यह है कि सिस्टम कैसे पहचाने कि ग्राहक का पेमेंट वास्तव में लोन की किस्त है या सामान्य वित्तीय सेवा का भुगतान.

त्यौहारी खरीदारी पर पड़ सकता है असर

इस समय सबसे बड़ी चिंता त्योहारी सीजन को लेकर है. दिवाली और दूसरे त्योहारों के दौरान UPI से बड़े पैमाने पर खरीदारी होती है. अगर MDR की लागत दुकानदारों तक पहुंचती है, तो वे इसे अपनी कीमतों में शामिल कर सकते हैं. इससे ग्राहकों के लिए खरीदारी थोड़ी महंगी हो सकती है. इंडस्ट्री को यह भी डर है कि अतिरिक्त चार्ज से ग्राहक UPI के बजाय नकद या कार्ड का इस्तेमाल बढ़ा सकते हैं.

ऐसे में डिजिटल पेमेंट की रफ्तार पर असर पड़ सकता है. यही वजह है कि मर्चेंट और पेमेंट कंपनियां सिस्टम को तैयार करने के लिए कुछ और समय चाहती हैं. फिलहाल अंतिम फैसला NPCI को लेना है. अगर नियम जनवरी 2027 तक टलता है, तो इंडस्ट्री को तकनीकी और नीतिगत उलझनें दूर करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाएगा.



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