पटना आईजीआईएमएस और एम्स पटना में कथित नियुक्ति घोटाले, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई।
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पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता डॉ. सत्येंद्र कुमार और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण पाठक ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को लेटर लिखकर मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की।
उन्होंने आरोप लगाया कि सीबीआई जांच जारी होने के बावजूद आईजीआईएमएस के निदेशक डॉ. बिंदे कुमार पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है।
जांच लगभग नौ महीने से चल रही
डॉ. सत्येंद्र कुमार ने बताया कि आईजीआईएमएस में नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान निदेशक डॉ. बिंदे कुमार के बेटे की नियुक्ति को लेकर सीबीआई जांच कर रही है। यह जांच लगभग नौ महीने से चल रही है, लेकिन इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई और न ही कोई प्रशासनिक कार्रवाई हुई है। इससे जांच एजेंसी की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
उन्होंने एम्स पटना के तत्कालीन निदेशक डॉ. जीके पॉल का उदाहरण दिया, जिनके खिलाफ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इसी तरह के मामले में कार्रवाई करते हुए उन्हें पद से हटा दिया था। हालांकि, आईजीआईएमएस के मामले में अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जो दोहरे मापदंड को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों को बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
राष्ट्रपति को लिखा है पत्र
डॉ. सत्येंद्र कुमार ने राष्ट्रपति को लिखे पत्र में पूरे मामले की जांच पटना हाईकोर्ट की निगरानी में सीबीआई से कराने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि जांच निष्पक्ष तरीके से होती है, तो कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
आईजीआईएमएस और एम्स पटना में कथित नियुक्ति घोटाले, भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ जांच की मांग।
उन्होंने बताया कि हाल में ही पेपर लीक और आयुष्मान भारत योजना में कई अनियमितता सामने आई है। डॉ. सत्येंद्र ने आरोप लगाया कि संस्थान में एमबीबीएस प्रश्न पत्र लीक का मामला सामने आने के बावजूद अब तक दोषियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
इसके अलावा आयुष्मान भारत योजना में करीब 45 लाख रुपये के गबन का मामला भी चर्चा में रहा। उनका कहना था कि लगातार वित्तीय अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं होना बेहद चिंताजनक है।
इधर अरुण पाठक ने कहा कि राज्य के बड़े चिकित्सा संस्थानों में इस तरह के आरोप सामने आना पूरे स्वास्थ्य तंत्र की साख को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे जरूरी है। यदि भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद पर रोक नहीं लगी, तो इसका खामियाजा आम मरीजों और छात्रों को भुगतना पड़ेगा।
संस्थानों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठा
उन्होंने कहा कि यह केवल एक नियुक्ति विवाद का मामला नहीं है, बल्कि संस्थानों की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा बड़ा सवाल है। इसलिए केंद्र सरकार और राज्य सरकार दोनों को इस मामले में गंभीरता से हस्तक्षेप करना चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी स्पष्ट किया गया कि संबंधित एजेंसियों की ओर से उचित कार्रवाई नहीं की जाती है, तो मामले को लेकर पटना हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की जायेगी। उन्होंने ने कहा कि न्यायपालिका की निगरानी में ही निष्पक्ष जांच संभव है और दोषियों को सजा मिल सकती है।
आईजीआईएमएस और एम्स पटना से जुड़े इस विवाद ने एक बार फिर राज्य के चिकित्सा संस्थानों की पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां और सरकार इस मामले में आगे क्या कदम उठाती हैं।
इस मामले में IGIMS संस्थान के निदेशक प्रो.(डॉ.) बिंदे से उनका पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क किया गया, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। संस्थान के प्रवक्ता सह उप निदेशक प्रो.(डॉ.) विभूति प्रसन्न सिन्हा से भी बयान पर प्रतिक्रिया जानने के लिए संपर्क किया गया, लेकिन प्रतिक्रिया नहीं मिली।

