बागेश्वर. कद्दू एक ऐसा सब्जी है, जिसे भारत के लगभग हर घर में अलग-अलग रूपों में पकाया जाता है. कभी सब्जी, कभी रायता, तो कभी पकौड़े के रूप में यह थाली की शान बनता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कद्दू के पौधे की बेल भी बेहद स्वादिष्ट और पौष्टिक सब्जी के रूप में खाई जाती है. खासकर उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में कद्दू की बेल की सब्जी को पारंपरिक व्यंजन का दर्जा प्राप्त है. यह डिश पहाड़ की लोक संस्कृति से जुड़ी है और खास मौसमी व्यंजन के रूप में घरों में बड़े चाव से बनाई जाती है.
ये रही बनाने की रेसिपी
बागेश्वर की कुशल गृहिणी अनीता टम्टा लोकल 18 से कहती हैं कि कद्दू की बेल का उपयोग करने के लिए इसके अंतिम कोमल हिस्से को तोड़ा जाता है. इन्हें अच्छी तरह धोकर पकाने के लिए तैयार किया जाता है. पारंपरिक तरीके से इस सब्जी को बनाने के लिए सबसे पहले सरसों के तेल में जीरा, हींग और मसालों का तड़का लगाया जाता है. इसके बाद इसमें प्याज, लहसुन, हरी मिर्च और टमाटर डालकर भून लिया जाता है. फिर इसमें आलू और कद्दू की बेल डालकर धीमी आंच पर पकाया जाता है. यह सब्जी जितनी आसानी से बन जाती है, उतनी ही लाजवाब स्वाद में होती है.
कद्दू की बेल केवल स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद मानी जाती है. इसमें आयरन, फाइबर, मिनरल्स और विटामिन्स भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. यह शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करती है, और पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में सहायक है. पहाड़ों में लोग इसे खास मौकों पर बनाते हैं और मानते हैं कि यह व्यंजन शरीर को हल्का और ऊर्जावान बनाए रखता है.
उत्तराखंड के लोगों के लिए कद्दू की बेल की सब्जी केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का हिस्सा है. त्योहारों और मेलों के दौरान गांव-घर में इस सब्जी को खास पकवानों में शामिल किया जाता है. पहले के समय में जब बाजार से सब्जियां लाना संभव नहीं होता था. तब लोग अपने खेतों और आंगनों में उगाई जाने वाली बेलों और पत्तियों से ही स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करते थे. कद्दू की बेल की सब्जी उन्हीं व्यंजनों में से एक है.
जरूरी फरमाइश
पहाड़ की इस अनोखी डिश का स्वाद अब धीरे-धीरे शहरों तक भी पहुंच रहा है. स्थानीय मेलों और फूड फेस्टिवलों में जब यह व्यंजन परोसा जाता है तो लोग इसे बड़े शौक से चखते हैं. पहाड़ से बाहर रह रहे उत्तराखंडी लोग भी जब अपने घर लौटते हैं, तो इस सब्जी की फरमाइश जरूर करते हैं. यह पहाड़ की मिट्टी और वहां की परंपरा से जोड़ती है.