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हिंदी सिनेमा के कई बड़े एक्टर्स ने अपने करियर की शुरुआत थियेटर से की थी. उन्होंने थियेटर में काम करते हुए अपने हुनर को निखारा. अब मनोज बाजपेयी ने थिएटर के दिनों के मजेदार किस्से सुनाए. उन्होंने बताया कि कैसे शुरुआत में रोल न मिलने पर नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज को एक नाटक में ढाई घंटे तक पेड़ बनकर खड़ा रहना पड़ता था. मनोज बाजपेयी को दिन-रात कड़ी रिहर्सल देखकर दोनों हैरान थे. वे एक्टिंग को ‘गधा मजदूरी’ समझकर छोड़ने की सोचने लगे थे.
नई दिल्ली: मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय राज हिंदी सिनेमा के चमकते सितारे हैं, जिनकी एक्टिंग का लोहा हर कोई मानता है. मगर कामयाबी की बुलंदी पर पहुंचने से पहले उन्होंने खूब स्ट्रगल किया था. मनोज बाजपेयी हाल में पुराने दिनों का एक ऐसा मजेदार किस्सा शेयर किया. नवाज-विजय के थियेटर के दिनों को याद किया.

नवाजुद्दीन और विजय राज काम की तलाश में जब एक बड़े थिएटर के डायरेक्टर से मिलने पहुंचे. डायरेक्टर साहब ने उनसे उनका बैकग्राउंड पूछा और एक्टिंग करने की वजह जाननी चाही. दिक्कत ये थी कि नाटक में कोई रोल खाली ही नहीं था. अब डायरेक्टर साहब भी जुगाड़ू निकले. उन्होंने कह दिया कि नाटक में पेड़ों की जरूरत है, तो चलो इन दोनों को ही पेड़ बना देते हैं.

मनोज बाजपेयी ‘फीवर एफएम’ को दिए इंटरव्यू में बताते हैं कि मंच पर पेड़ बनने वाले सिर्फ ये दोनों नहीं थे, बल्कि सात-आठ लोगों का पूरा का पूरा ग्रुप था. इन भावी सुपरस्टार्स को नाटक के दौरान ढाई-ढाई घंटे तक बिना हिले-डुले, बस पेड़ बनकर सीधे खड़े रहना पड़ता था. अब आप खुद ही सोचिए, जो एक्टर बनने के सपने लेकर आए थे, उन्हें स्टेज पर लकड़ी की तरह खड़ा कर दिया गया.
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किस्सा यहीं खत्म नहीं होता. मनोज बाजपेयी उस वक्त थिएटर में पागलों की तरह दिन-रात रिहर्सल किया करते थे. उनकी इस खतरनाक मेहनत को देखकर नवाजुद्दीन और विजय राज के होश उड़ गए. उन्हें अपने एक्टिंग के फैसले पर ही शक होने लगा था. वो सोचने लगे कि भाई, स्टार बनने का रास्ता इतना कठिन होता है क्या?

मनोज ने हंसते हुए पुरानी यादें ताजा कीं और बताया कि नवाज और विजय अक्सर बाहर जाकर आपस में बातें करते थे. वो मनोज को देखकर कहते थे, ‘यार, ये आदमी तो इतनी गधा मजदूरी कर रहा है, क्या एक्टिंग में सचमुच इतनी घिसाई करनी पड़ती है?’ मनोज की तगड़ी रिहर्सल देखकर तो दोनों एक बार के लिए बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस भागने का मन बना चुके थे.

मजेदार ट्विस्ट तब, आया जब दोनों कलाकार डायरेक्टर साहब के लिए ‘पनौती’ बन गए. हुआ ये कि एक बार डायरेक्टर साहब जोश-जोश में डायरेक्शन दे रहे थे और अचानक इन दोनों से टकराकर जोर से गिर पड़े. चोट इतनी गहरी थी कि डायरेक्टर के हाथ में स्क्रू तक लगवाने पड़ गए.

थिएटर के बाकी लोग डायरेक्टर साहब को चिढ़ाने लगे कि ये दोनों लड़के आपके लिए पनौती हैं. हालत ये हो गई थी कि उस एक्सीडेंट के बाद डायरेक्टर साहब पूरे नाटक में सिर्फ अपने एक हाथ से ही इंस्ट्रक्शन्स दे पाते थे. आज भी जब ये तीनों इस बात को याद करते हैं, तो हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते हैं.

मनोज बाजपेयी का कहना है कि पेड़ बनने और गधा मजदूरी वाले उन्हीं दिनों ने उनकी दोस्ती को मजबूत बना दिया. वे तीनों सिर्फ काम के साथी नहीं थे, बल्कि साथ में सफर करते थे. एक ही हॉल में सोते थे और मेस या ढाबे पर जो मिलता, साथ खाते थे. संघर्ष के उसी दौर ने आज उन्हें इस मुकाम पर पहुंचाया है.

