‘अगर राष्ट्रपति या कोई राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयकों पर वर्षों तक मंजूरी नहीं देते हैं तो क्या अदालत असहाय बनी रहेगी…’ सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई भूषण आर. गवई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मंगलवार को यह कहते हुए गंभीर चिंता जताई. कोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की तरफ से अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गए संदर्भ की सुनवाई कर रही है. यह संदर्भ शीर्ष अदालत के 8 अप्रैल के उस ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें पहली बार राज्यपालों और राष्ट्रपति को राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा तय की गई थी. इस बेंच में CJI के अलावा जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस. चंदुरकर भी शामिल हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘दोनों सदनों से विधेयक पारित हो जाता है, तो राष्ट्रपति या राज्यपाल उसे अनिश्चितकाल तक पेंडिंग क्यों रख सकते हैं? हम मानते हैं कि अदालत समयसीमा तय नहीं कर सकती, लेकिन अगर कोई वर्षों तक इसे टालता रहे तो क्या अदालत बेबस रहेगी?’
संसद को करना चाहिए फैसला, अदालत को नहीं
सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने मध्य प्रदेश सरकार की ओर से दलील दी कि ऐसे मामलों का निर्णय संसद को करना चाहिए, अदालत को नहीं. उन्होंने कहा कि चर्चा की शुरुआत इस धारणा से नहीं होनी चाहिए कि राष्ट्रपति या राज्यपाल को दिए गए विवेकाधिकार का दुरुपयोग होगा. महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, गोवा, छत्तीसगढ़ और हरियाणा की ओर से पेश वरिष्ठ वकीलों ने भी यही राय रखी कि राष्ट्रपति या राज्यपाल पर अदालत द्वारा समय-सीमा थोपना उचित नहीं है.
यह पूरा विवाद तमिलनाडु मामले से उपजा था, जहां सत्ताधारी डीएमके का आरोप था कि राज्यपाल विधानसभा से पारित विधेयकों को लंबे समय से अपने पास ही रोके हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की इस निष्क्रियता को ‘अवैध’ बताते हुए 10 विधेयकों को अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर स्वीकृत मान लिया था. उस फैसले में अदालत ने राष्ट्रपति को तीन महीने और राज्यपाल को एक महीने के भीतर विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा तय की थी.
‘स्वतः स्वीकृति नहीं मानी जा सकती’
इस सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने महाराष्ट्र की ओर से दलील दी कि अनुच्छेद 201 के तहत केंद्र सरकार राज्य के बिल को रोक सकती है, और यह ‘उच्च विवेकाधिकार’ का मामला है. उन्होंने कहा कि राज्यपाल का सहमति न देना व्यक्तिगत वीटो नहीं है और बिल पारित हो जाने के बाद भी स्वतः स्वीकृति नहीं मानी जा सकती.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से स्पष्ट किया कि मनी बिल जैसे मामलों में सहमति रोकने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि ऐसे विधेयकों के लिए पहले से ही राज्यपाल की अनुशंसा अनिवार्य होती है. राजस्थान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने खुद अनुच्छेद 200 में सहमति रोके जाने की संभावना को जोड़ा है और यह विधायी प्रक्रिया का हिस्सा है, जिस पर अदालत से आदेश नहीं हो सकता.
उत्तर प्रदेश और ओडिशा की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल को ऐसे मामलों में पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त है. गोवा की ओर से एएसजी विक्रमजीत बनर्जी ने दलील दी कि संविधान में ‘मानी हुई सहमति’ का प्रावधान नहीं है और अदालत इसे गढ़ नहीं सकती. वहीं, छत्तीसगढ़ की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता महेश जेठमलानी ने कहा कि राज्यपाल पर समय-सीमा थोपना ‘अनुचित और असम्मानजनक’ है और अनुच्छेद 32 के तहत ऐसी याचिकाओं से राहत नहीं मिल सकती.
इन दलीलों के साथ अदालत ने मंगलवार को संदर्भ के पक्ष में पेश हुए वकीलों की सुनवाई पूरी की और अब बुधवार को दूसरे पक्ष की दलीलें सुनेगी.