भोपाल एम्स में जहां एक तरफ अंगदान से नई जिंदगी की उम्मीद जगी, वहीं दूसरी तरफ प्रत्यारोपण की जटिलताओं ने एक जीवन छीन लिया। बुधवार को दूसरा हार्ट ट्रांसप्लांट किया गया। जिस मरीज में ह्रदय को प्रत्यारोपित किया गया, उसकी गुरुवार सुबह मौत हो गई है। जिसका
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11 घंटे की सर्जरी बाद रात 9 बजे हार्ट ने शुरू किया था काम
एम्स भोपाल में हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए मरीज को ओटी में बुधवार सुबह 10 बजे अंदर लिया गया। दोपहर 12 बजे तक अंग दाता से निकाला गया हार्ट, रिसीवर मरीज में लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई। पूरी प्रक्रिया के दौरान मुख्य धमनियों में क्लैम्प लगाए जाते हैं।
साथ ही हार्ट का ब्लड फ्लो करने का काम एक मशीन के द्वारा होता है। जिसे सरल भाषा में आर्टिफिशियल हार्ट लंग मशीन कहते हैं। इसी बीच मरीज के शरीर से पुराने हार्ट को निकाल कर नया हार्ट लगाया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया रात 9 बजे चली। इसके बाद क्लैम्प हटा दिए गए और नए हार्ट ने ब्लड फ्लो करने का काम शुरू कर दिया।
रात 12 बजे से स्थिति बिगड़ने लगी
हार्ट ट्रांसप्लांट पूरा होने के करीब 3 घंटे बाद 12 बजे, अचानक मरीज की स्थिति बिगड़ने लगी। मरीज की हार्ट की रिदम (जिस एक लय में दिल ब्लड फ्लो करता है) बिगड़ने लगी। इस समय डॉक्टरों को पता चला कि बॉडी ने नए हार्ट को दुश्मन मान लिया है और उस पर अटैक कर दिया है।
स्थिति को देखते हुए, डॉक्टरों ने रिजेक्शन को स्लो करने के लिए इलाज शुरू किया। जिसमें शरीर की इम्यूनिटी जो हार्ट पर अटैक कर रही होती है, उसे दवाओं के जरिए कमजोर किया जाता है। रात 3 बजे तक यह प्रक्रिया चली, इस बीच मरीज को आईसीयू से वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया था। करीब साढ़े 3 घंटे के प्रयास के बाद भी मरीज को बचाया नहीं जा सका। गुरुवार तड़के सुबह 3:55 बजे मरीज को मृत घोषित कर दिया गया।
क्या है एक्यूट रिजेक्शन सिंड्रोम
एक्यूट रिजेक्शन सिंड्रोम या सिर्फ एक्यूट रिजेक्शन के रूप में इस स्थिति को जाना जाता है। यह अंग प्रत्यारोपण के बाद बनती है। यह तब होता है। जब रिसीवर का शरीर गलती से प्रत्यारोपित अंग (जैसे किडनी, हृदय, यकृत आदि) को एक विदेशी वस्तु के रूप में पहचानता है। उस पर हमला करना शुरू कर देता है।
इसे एक्यूट इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह आमतौर पर प्रत्यारोपण के बाद कभी भी हो सकता है। यही नहीं, इसमें शरीर अचानक अपनी पूरी ताकत से अंग के खिलाफ हमला शुरू कर देता है। इसके उलट ऐसे मरीजों में एक क्रोनिक रिजेक्शन की स्थिति भी बनती है। जो महीनों या सालों बाद धीरे-धीरे नए अंग पर हमला शुरू करती है।
शरीर की खूबी ही बनी दुश्मन
एम्स के डॉक्टरों के अनुसार, मानव शरीर में एक प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) होती है। जो हमें संक्रमणों और बीमारियों से बचाती है। यह प्रणाली बाहरी हमलावरों जैसे बैक्टीरिया, वायरस और अन्य विदेशी कोशिकाओं को पहचानती है और उन्हें नष्ट करने का प्रयास करती है। जब किसी व्यक्ति को किसी और का अंग लगाया जाता है तो यह प्रणाली नए अंग को भी एक विदेशी वस्तु के रूप में पहचान सकती है। ऐसा होने पर यह अंग को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती है। जिससे वह ठीक से काम करना बंद कर सकता है।
रिजेक्शन होने पर ऐसे लक्षण आते हैं नजर
- बुखार
- फ्लू जैसे लक्षण (थकान, शरीर में दर्द, ठंड लगना)
- प्रत्यारोपण वाले स्थान पर दर्द या सूजन
- अंग के कार्य में कमी
किडनी ट्रांसप्लांट के मरीज की स्थिति में सुधार
बुधवार को एम्स में दूसरे हार्ट ट्रांसप्लांट के साथ 11वां किडनी ट्रांसप्लांट भी हुआ। राहत की बात यह है कि किडनी ट्रांसप्लांट के मरीज की स्थिति में सुधार देखा जा रहा है। एम्स के निदेशक डॉ. अजय सिंह ने बताया कि हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया सफल रही थी। लेकिन, मरीज एक्यूट रिजेक्शन सिंड्रोम की स्थिति में चला गया। डॉक्टरों की टीम ने काफी प्रयास किया लेकिन मरीज को बचा नहीं सके। कुल ट्रांसप्लांट के मामलों में से 30 फीसदी में ऐसी स्थिति बनती है।
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भोपाल AIIMS में पहली बार ऑपरेशन थिएटर में हुआ पोस्टमॉर्टम

भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में पहली बार ऑपरेशन थिएटर (ओटी) के अंदर ही एक ब्रेन डेड मरीज का पोस्टमॉर्टम (अटॉप्सी) किया गया।
यह प्रदेश का पहला ऐसा सरकारी अस्पताल बन गया है, जहां अंगदान के बाद परिवार की भावनाओं का सम्मान करते हुए त्वरित और संवेदनशील प्रक्रिया अपनाई गई। ओबैदुल्लागंज के 60 वर्षीय शंकर लाल कुबेर ने जाते-जाते तीन लोगों को नया जीवन देकर मानवता की मिसाल पेश की है।

ऑपरेशन थिएटर के अंदर ही ब्रेन डेड मरीज का पोस्टमॉर्टम इस टीम ने किया।
उनके परिजन चाहते थे कि शव को सुबह 11 बजे तक उन्हें सौंप दिया जाए, ताकि वे सूर्यास्त से पहले दाह संस्कार कर सकें। एम्स प्रबंधन ने परिवार की इस इच्छा को पूरा करना अपनी जिम्मेदारी समझा, क्योंकि शंकर के अंगदान से तीन जिंदगियां रोशन होने वाली थीं। पढ़ें पूरी खबर
पहली बार ब्रेनडेड मरीज का अंगदान

भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने बुधवार को अपना पहला ‘कैडेवर ऑर्गन डोनेशन’ सफलतापूर्वक किया। AIIMS भोपाल प्रदेश का ऐसा पहला सरकारी अस्पताल बन गया है, जहां किसी ब्रेन डेड मरीज के अंग प्रत्यारोपण (ऑर्गन हार्वेस्ट) के लिए निकाले गए। औबेदुल्लागंज के 60 वर्षीय शंकर लाल कुबरे ने मौत के बाद तीन लोगों की जिंदगी को रोशन कर दिया। पढ़ें पूरी खबर

