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Wild Fruit Pickles India: कभी भारत के गांवों में अचार का मतलब सिर्फ रसोई की एक चीज नहीं, बल्कि मौसम, जंगल और पुरानी परंपराओं को सहेजने का तरीका हुआ करता था. सुपरमार्केट में मिलने वाली रंग-बिरंगी अचार की बोतलों से बहुत पहले, देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग जंगलों और खेतों के आसपास उगने वाले देसी फलों को मसालों के साथ मिलाकर सालभर के लिए सुरक्षित रखते थे. इन अचारों में सिर्फ खट्टापन या स्वाद नहीं होता था, बल्कि उस जगह की मिट्टी, मौसम और लोगों की जीवनशैली की झलक भी मिलती थी. करोंदा से लेकर टिमरू बेर तक, भारत के कई जंगली फल आज भी पारंपरिक अचार की पहचान बने हुए हैं.
भारत के जंगलों से निकला अचार का पुराना स्वाद आज जब बाजार में हर तरह के अचार आसानी से मिल जाते हैं, तब भी कई ग्रामीण इलाकों में घर की बनी अचार की बरनी का महत्व कम नहीं हुआ है. खासकर जंगली और स्थानीय फलों से तैयार किए गए अचार पीढ़ियों से लोगों की रसोई का हिस्सा रहे हैं. इन फलों की खास बात यह है कि ये स्थानीय मौसम के अनुसार मिलते हैं और इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए नमक, तेल और मसालों का इस्तेमाल किया जाता है. यही तरीका पुराने समय में लोगों को बिना फ्रिज के भी स्वाद बचाए रखने में मदद करता था.

लसोड़ा का अचार: राजस्थान और उत्तर भारत की पहचान लसोड़ा यानी गोंदी जैसे छोटे फल का अचार राजस्थान और उत्तर भारत के कई हिस्सों में पुराने समय से बनाया जाता रहा है. इसकी खासियत इसका हल्का चिपचिपा texture है, जो इसे बाकी अचारों से अलग बनाता है. घर की बुजुर्ग महिलाएं अक्सर इसे खास मसालों के साथ तैयार करती थीं. इसका स्वाद साधारण खाने को भी खास बना देता है.

पूर्वोत्तर भारत का चोल्टा और देसी अचार परंपरा पूर्वोत्तर भारत में मिलने वाला चोल्टा यानी Elephant Apple भी पारंपरिक अचार का हिस्सा रहा है. असम, मेघालय और आसपास के क्षेत्रों में इसे उबालकर सरसों के तेल, गुड़ और मसालों के साथ तैयार किया जाता है. इसका स्वाद खट्टा-मीठा होता है और यह स्थानीय भोजन के साथ खूब पसंद किया जाता है.
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महुआ फल: जंगलों से जुड़ी परंपरा महुआ का नाम सुनते ही अक्सर इसके फूलों की चर्चा होती है, लेकिन कई आदिवासी और ग्रामीण समुदाय इसके फल का भी इस्तेमाल करते हैं. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में महुआ से जुड़े पारंपरिक खाद्य पदार्थों की लंबी परंपरा रही है. महुआ सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि कई समुदायों की संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा रहा है.

बेर और टिमरू: पहाड़ों और गांवों की बरनियों में कैद स्वाद बेर का अचार पंजाब, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड जैसे क्षेत्रों में लोकप्रिय है. इसे अक्सर गुड़, सरसों के तेल और मसालों के साथ बनाया जाता है. वहीं हिमालयी क्षेत्रों में मिलने वाला टिमरू बेर पहाड़ी समुदायों के बीच पारंपरिक रूप से संरक्षित किया जाता रहा है. नमक और मसालों के साथ इसे लंबे समय तक रखा जाता है.

कोकम: पश्चिमी घाट का खट्टा स्वाद महाराष्ट्र, गोवा और कोंकण क्षेत्र में पाया जाने वाला कोकम आमतौर पर गर्मियों के पेय के लिए जाना जाता है, लेकिन इससे अचार भी बनाया जाता है. कोकम का खट्टा और हल्का मीठा स्वाद इसे खास बनाता है. स्थानीय रसोई में इसे मसालों के साथ मिलाकर अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है.

करोंदा: खट्टे स्वाद वाला देसी खजाना मध्य भारत, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे इलाकों में मिलने वाला करोंदा अपने खट्टे स्वाद के लिए जाना जाता है. इसका स्वाद कुछ हद तक क्रैनबेरी जैसा महसूस होता है, इसलिए इससे बना मसालेदार अचार गांवों में काफी पसंद किया जाता है. करोंदे का अचार खासकर गर्मियों में बनाया जाता है. सरसों का तेल, लाल मिर्च और मसालों के साथ इसका स्वाद और भी बढ़ जाता है. कई ग्रामीण परिवार आज भी इसे पारंपरिक तरीके से तैयार करते हैं.

सिर्फ अचार नहीं, एक सांस्कृतिक विरासत इन जंगली फलों से बने अचार सिर्फ खाने की चीज नहीं हैं. ये भारत के अलग-अलग इलाकों की जीवनशैली, स्थानीय ज्ञान और प्रकृति के साथ रिश्ते को दिखाते हैं. आज जब लोग दोबारा देसी स्वाद और पारंपरिक खानपान की ओर लौट रहे हैं, तब इन पुराने अचारों की अहमियत भी बढ़ रही है. एक छोटी सी बरनी में बंद ये स्वाद दरअसल भारत के जंगलों और गांवों की पुरानी कहानी सुनाते हैं.

