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फिल्म में हीरो को टक्कर देने वाला विलेन जितना खूंखार होता है, मूवी देखने का रोमांच उतना ही बढ़ जाता है.70-80 और 90 के दशक में कुछ फिल्में आई जिनमें आइकॉनिक विलेन थे. ‘शोले’ के ‘गब्बर सिंह’, ‘शान’ मूवी के ‘शाकाल’, ‘मिस्टर इंडिया’ के ‘मोगेंबो’ को भला कौन भूल सकता है. इन खलनायकों के किरदार और इन्हें निभाने वाले एक्टर अमर हो गए. 22 साल के अंतराल में सिनेमाघरों में तीन ऐसी फिल्में आईं जिनके विलेन के नाम करीब-करीब एक जैसे थे. एक मूवी ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर साबित हुई तो दूसरी मूवी सुपरहिट रही. एक फ्लॉप होकर भी दिल में बस गई. दो फिल्मों में विनोद खन्ना तो एक फिल्म में राज कुमार नजर आए थे.
यह सच है कि बॉलीवुड फिल्म हो या हॉलीवुड, मूवी में विलेन का होना जरूरी है. जब तक विलेन नहीं होगा, फिल्म देखने में मजा नहीं आएगा. 70-80 और 90 के दशक में फिल्मों में डायरेक्टर-प्रोड्यूसर सबसे ज्यादा मेहनत ‘विलेन’ के किरदार, उसके स्क्रीन पर नाम पर करते थे. 70 के दशक में तो कई हीरो ही विलेन का रोल करते थे. शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत निगेटिव रोल्स से की. अमजद खान से लेकर अमरीश पुरी तक निगेटिव रोल निभाने वाले एक्टर ने ‘विलेन’ के रूप में खूब नाम कमाया. 22 साल के अंतराल में बॉलीवुड में 3 ऐसी फिल्में भी आईं जिनमें विलेन के नाम लगभग एक जैसे थे. ये फिल्में थीं : मेरा गांव मेरा देश, शोले और इंसानियत के देवता. इन तीनों फिल्मों के विलेन का नाम मिलता-जुलता था.

सबसे पहले बात करते हैं 13 अगस्त 1971 में रिलीज हुई ‘मेरा गांव मेरा देश’ फिल्म की जिसका डायरेक्शन राज खोसला ने किया था.
राज खोसला ने स्टोरी डिपार्टमेंट बना रखा था जिसमें कई लेखक स्टोरी लिखते थे. फिल्म की कहानी खोसला एंटरप्राइजेज स्टोरी डिपार्टमेंट ने लिखी थी. राज खोसला के भाई लेखराज खोसला और बोलू खोसला फिल्म के प्रोड्यूसर थे. स्क्रीनप्ले जीआर कामत ने लिखा था. डायलॉग अख्तर रोमानी ने लिखे थे. धर्मेंद्र, आशा पारेख और विनोद खन्ना लीड रोल में थे. सबसे दिलचस्प बात यह है कि विनोद खन्ना ही फिल्म के विलेन थे. उन्होंने ‘जब्बर सिंह’ डाकू का किरदार निभाया था. फिल्म के क्लाइमैक्स में उनकी फाइट धर्मेंद्र से होती है.

म्यूजिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने तैयार किया था. गीतकार आनंद बक्शी थे. फिल्म के सभी गाने सुपरहिट थे. फिल्म के दो गाने ‘हाय शरमाऊं, किस-किस को बताऊं अपनी प्रेम कहानियां, ‘मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए’ तब से लेकर आज तक हिट हैं. दोनों गाने लता मंगेशकर की सुरीली आवाज में थे. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में धर्मेंद्र ने कॉमेडी, रोमांस और एक्शन हर डिपॉर्टमें में शानदार एक्टिंग से सबका दिल जीत लिया. फिल्म में गांव की पागल औरत का किरदार पूर्णिमा दास ने निभाया था. उनका असली नाम मेहरबानो था जो कि महेश भट्ट की सगी मौसी थीं. मुन्नी बाई का किरदार लक्ष्मी छाया ने निभाया था. राजस्थान के उदयपुर के एक गांव में फिल्म की शूटिंग हुई थी.
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‘मेरा गांव मेरा देश’ ही वो फिल्म है जिसने धर्मेंद्र को एक्शन हीरो के तौर पर बॉलीवुड में पहचान दी. एक्शन हीरो के तौर पर धर्मेंद्र छा गए थे. आगे चलकर ‘शोले’ और ‘प्रतिज्ञा’ जैसी कई एक्शन फिल्में धर्मेंद्र सुपरस्टार बनकर उभरे. वहीं विनोद खन्ना बहुत ही डोमिनेटिंग रहे. वो जब-जब पर्दे पर आए दर्शक सीटियां बजाने के लिए मजबूर हुए. यह फिल्म जब रिलीज हुई तब कोई नहीं जानता था कि यह मूवी हिंदी सिनेमा के इतिहास की आइकॉनिक फिल्म के लिए प्लॉट तैयार करेगी. जब भी शोले फिल्म का नाम लिया जाता है तो मेरा गांव मेरा देश की भी चर्चा होती है. दिलचस्प बात यह भी है कि दोनों ही फिल्मों में धर्मेंद्र ने काम किया है. यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी. फिल्म में विनोद खन्ना ‘जब्बर सिंह’ के रोल में छाए रहे.

इस कड़ी में दूसरी फिल्म ‘शोले’ है जो हिंदी सिनेमा की सर्वेश्रेष्ठ फिल्मों में शामिल है. सच ही कहा जाता है कि ‘शोले’ जैसी आइकॉनिक फिल्में बस बन जाती हैं. ‘मेरा गांव मेरा देश’ फिल्म की कहानी को सलीम-जावेद ने नए अंदाज में लिखा. यह भी दिलचस्प है कि जहां ‘मेरा गांव मेरा देश’ 13 अगस्त 1971 में रिलीज हुई वहीं ‘शोले’ फिल्म 15 अगस्त 1975 को सिनेमाघरों में आई थी. धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, संजीव कुमार, अमजद खान लीड रल में थे. फिल्म का डायरेक्शन रमेश सिप्पी ने किया था. प्रोड्यूसर जीपी सिप्पी थे. जय-वीरू यानी अमिताभ बच्चन-धर्मेंद्र की जोड़ी इसी फिल्म में नजर आई थी. हेमा मालिनी ने बसंती का कालजयी किरदार निभाया था.

यह भी दिलचस्प है कि ‘शोले’ फिल्म में जहां अमजद खान ने गब्बर सिंह डाकू बनकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया वहीं ‘मेरा गांव मेरा देश’ फिल्म में अमजद खान के पिता जयंत ने मेजर जसवंत सिंह का किरदार निभाया था. उनका वास्तविक नाम जकरिया खान था. एक फिल्म में जहां पिता ने किरदार निभाया, वहीं दूसरी फिल्म में बेटे ने शानदार एक्टिंग की. हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा सुखद संयोग बहुत ही काम देखने को मिलता है. यह भी हैरान करने वाली बात है कि फिल्म में 66 मिनट बाद गब्बर सिंह की एंट्री होती है. इतनी देर बाद मिली एंट्री के बाद वो भी छा गए. ‘शोले’ ने अमजद खान को फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित किया. उन्हें ‘गब्बर सिंह’ के तौर पर अमर पहचान दी. उन्होंने ऐसा किरदार गढ़ा, जो बॉलीवुड के विलेन की कसौटी बन गया. अमजद खान ने खास तरह की संवाद अदायगी के चलते इस कैरेक्टर को ‘लार्जर दैन लाइफ’ बना दिया.

मेरा गांव मेरा देश औ शोले दोनों फिल्मों में कई समानताए हैं. फिल्म में हर किसी का काम असाधारण था. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में अजित बने धर्मेंद्र जहां सिक्का उछालकर कोई बड़ा फैसला लेते हैं, वहीं ‘शोले’ फिल्म में जय (अमिताभ बच्चन) सिक्का उछालते हैं. मजेदार बात यह भी है कि विनोद खन्ना का नाम फिल्म में जब्बर सिंह रहता है, वही शोले फिल्म में हमें ‘गब्बर सिंह’ नाम का डाकू अमजद खान के रूप में दिखाई देता है. मेरा गांव मेरा देश में अजित शराब पीता है. बाद में शराब छोड़ देता है. शोले में वीरू शराब पीता है. बसंती से प्यार का इजहार शराब पीकर ही गांववालों के सामने करता है. मेरा गांव मेरा देश में धर्मेंद्र, आशा पारेख को बंदूक चलाना सिखाते हैं. कुछ इसी तरह का सीन हमें शोले फिल्म में भी दिखाई देता है जहां धर्मेंद्र, बसंती यानी हेमा मालिनी को बंदूक चलाना सिखाते हैं. मेरा गांव मेरा देश में पौने घंटे बाद ‘जब्बर सिंह’ यानी विनोद खन्ना की एंट्री होती है. वहीं शोले में एक घंटे बाद पर्दे पर गब्बर सिंह यानी अमजद खान की एंट्री होती है.

शोले फिल्म जब रिलीज हुई तो पूरे एक हफ्ते तक नहीं चली थी. प्रोड्यूसर समेत पूरी टीम को यकीन हो गया था कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी. फिल्म का क्लाइमैक्स बदलने के लिए अमिताभ बच्चन के घर पर सलीम-जावेद और रमेश सिप्पी की बैठक भी हुई थी. फिर ऐसा चमत्कार हुआ कि फिल्म ने इतिहास रच दिया. यह ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर फिल्म में शुमार है. हिंदी सिनेमा के इतिहास में सबसे ज्यादा टिकट इस फिल्म के बिकने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी शोले के नाम है. शोले ने उस समय 50 करोड़ का कलेक्शन किया था.

इस लिस्ट में सबसे आखिरी नाम ‘इंसानियत के देवता’ फिल्म का है जो कि 12 फरवरी 1993 में रिलीज हुई थी. डायरेक्शन केसी बोकाड़िया ने किया था. फिल्म में रजनीकांत, विनोद खन्ना, राज कुमार, जया प्रदा, मनीषा कोइराला, वर्षा उसगांवकर और विवेक मुश्रान ने अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा था. म्यूजिक आनंद-मिलिंद का था. यह एक एक्शन फिल्म थी. राज कुमार साहब को इस फिल्म के लिए 25 लाख रुपये की फीस दी गई थी. पहले इस फिल्म का टाइटल ‘कसम मेरे देश की’ था. फिल्म में विलेन रामी रेड्डी के किरदार का नाम ‘जब्बर सिंह’ था. यही नाम विनोद खन्ना का ‘मेरा गांव मेरा देश’ में था. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप रही थी.

