राजस्थान की तपती रेत पर जब कमायचा और रावणहत्था के तार छिड़ते हैं तो एक ऐसी प्रेम कहानी गूंजती है जो सदियों बाद भी अमर है। यह कहानी है ‘ढोला-मारू’ की।
.
इस प्रेम कहानी को टटोलने दैनिक भास्कर अजमेर से 95 किलोमीटर दूर केकड़ी के ‘बघेरा’ और मध्य प्रदेश के ‘नरवर‘ पहुंचा तो यहां ढोला-मारू के ऐतिहासिक विवाह के साक्ष्य इस अनूठी प्रेम कहानी की गवाही देते नजर आए।
जानिए 11वीं शताब्दी की वो प्रेम कहानी जिसकी शुरुआत एक भीषण अकाल और दो राजाओं की गहरी दोस्ती से हुई-
बात सदियों पुरानी है। ग्यारहवीं सदी का बीकानेर तब ‘जांगलदेश’ कहलाता था। उस साल यहां ऐसा खौफनाक अकाल पड़ा कि बूंद-बूंद पानी के लिए हाहाकार मच गया और मारवाड़ की धरती का कण-कण पानी के लिए तरस उठा था। चारों तरफ एक ही मंजर था— अकाल का सन्नाटा। उस समय जांगल प्रदेश के पूगल ठिकाने पर राज करते थे राजा पिंगल…
11वीं शताब्दी के जांगल प्रदेश (बीकानेर) के पूगल ठिकाने पर राजा पिंगल का शासन था।
अकाल के वक्त पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में ली शरण
अकाल के दर्दनाक मंजर को देख राजा पिंगल की आंखों में बेबसी के आंसू थे। अपनी प्रजा और परिवार को वे तड़पता नहीं देख पा रहे थे। ऐसे में उन्होंने भारी मन से अपनी मातृभूमि छोड़ पड़ोसी राज्य नरवर (मध्य प्रदेश) में शरण लेने का फैसला लिया। नरवर के राजा नल राजा पिंगल के अच्छे मित्र थे।
तैयारी करो! हम आज ही मरुधरा छोड़ रहे हैं। जब तक यहां के हालात नहीं सुधरते, हम पड़ोसी राज्य नरवर में शरण लेंगे, राजा पिंगल ने मंत्रियों को आदेश दिए।
उधर, नरवर में चारों तरफ हरियाली, बहता हुआ पानी और खुशहाली थी। राजा नल दरबार में थे, जब अचानक सैनिक ने उन्हें राजा पिंगल पर आए संकट की सूचना दी।

पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के राजा नल का नरवर उस समय हरा-भरा था।
संकट की घड़ी में स्वागत किया मित्र राजा नल ने
महाराज की जय हो! पूगल के राजा पिंगल परिवार और अपनी प्रजा के साथ हमारे राज्य की सीमा पर पहुंचे हैं। वे भारी संकट में हैं महाराज, सैनिक ने राजा नल को जानकारी दी।
मित्र के दुख में जो खड़ा न हो, वो राजा कैसा ! तुरंत उनके स्वागत की तैयारी करो! उनके रहने, खाने और घोड़ों के चारे का पूरा इंतजाम किया जाए, सूचना मिलते ही राजा नल ने मंत्रियों को आदेश दिया।
राजा पिंगल के नरवर महल पहुंचने पर राजा नल ने अपने दोस्त का दिल खोलकर स्वागत किया।
पिंगल, तुम नरवर में खुद को पराया मत समझना। जब तक पूगल के हालात ठीक नहीं होते, यह तुम्हारा ही घर है। राजा पिंगल अपने मित्र के इस प्रेम को देख भावुक थे।
मरुधरा से आई ‘अच्छी खबर’
कुछ ही समय बीता था कि एक दिन राजा पिंगल को उनके सैनिक ने अच्छी खबर सुनाई।
हुकुम! पूगल से संदेश आया है। मरुधरा पर काले बादलों ने डेरा डाल दिया है। झमाझम बारिश हो रही है! सूखी नदियां फिर से बह निकली हैं। अकाल खत्म हो गया है दाता!, सैनिक उत्साहित था।
राजा पिंगल ने आसमान की तरफ हाथ जोड़े और नल से बोले- मित्र, मातृभूमि हमें पुकार रही है। अब विदा लेने का समय आ गया है।
विदा की उदासी के बीच खिलखिला दी मासूमियत
विदा लेने का वक्त आया और अपने मित्र के जाने की बात सुन कर राजा नल भावुक हो उठे। तभी ढोला दौड़ते हुए आया और मारू के पालने को हिलाने लगा। इस पर मारू खिलखिलाकर हंस पड़ी। मासूमों की हंसी देखकर दोनों राजाओं के चेहरे खिल उठे।
देखो पिंगल, इन बच्चों को। जैसे बरसों पुरानी पहचान हो। क्यों न हम इस पुरानी दोस्ती को एक नए और अटूट रिश्ते में बदल दें, राजा नल ने मित्र पिंगल के सामने प्रस्ताव रख दिया।
यह सुनकर राजा पिंगल की आंखों में चमक आ गई।
रिश्तेदारी? तुम्हारे कहने का मतलब… दोनों का विवाह? राजा पिंगल उत्साह के साथ बोले।
हां मित्र! मेरा बेटा ढोला और तुम्हारी बेटी मारू। दोनों का गठबंधन करा देते हैं। हमारी दोस्ती हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो जाएगी, राजा नल ने साफ शब्दों में कह दिया।
वराह देव का आशीर्वाद, दोस्ती को रिश्ते में बदलने का वादा
इस प्रस्ताव पर राजा पिंगल उत्साहित हो उठे। दोनों मित्रों ने तय किया कि बघेरा की पावन भूमि पर वराह देव के आशीर्वाद से वे इस शुभ कार्य को संपन्न करेंगे।
इसके साथ ही नगाड़े बजाते हुए पूरे महल में इस विवाह की घोषणा कर दी गई। …और इस तरह राजा पिंगल की बेटी मारवणी (मारू) और राजा नल का बेटा साल्हकुमार (ढोला) का बाल विवाह तय हुआ। इस समय मारू डेढ़ साल की थी और ढोला की उम्र थी तीन वर्ष।
अकाल खत्म हो चुका था और राजा पिंगल का पूगल लौटना तय था। क्या दोनों दोस्तों ने एक दूसरे को दिया वादा पूरा किया? क्या वाकई ढोला और मारू का विवाह हुआ?
जानिए अगले एपिसोड में….
(यह लोक कथा पुरानी परंपराओं, ऐतिहासिक संदर्भ और सांस्कृतिक मान्यताओं पर आधारित है। बाल विवाह एक सामाजिक बुराई और कानूनन अपराध है। दैनिक भास्कर बाल विवाह जैसी किसी भी कुप्रथा का समर्थन नहीं करता। कहानी को रोचक बनाने के लिए क्रिएटिव लिबर्टी का इस्तेमाल किया गया है। सोर्स : राजस्थानी साहित्य, लोक कथाएं व स्थानीय लोगों से बातचीत। )
इनपुट सहयोग– अनुराग हर्ष, सुनील जैन, सुजान सिंह, कपिल मिश्रा (शिवपुरी), स्वाति पाठक
रिसर्च सहयोग– ममता कुमारी
….
पढ़िए महेंद्र-मूमल की प्रेम कहानी ….
1. रेगिस्तान में काक नदी के किनारे था मूमल का महल:अमरकोट के राजा और जैसलमेर की राजकुमारी का प्रेम; 4 एपिसोड में मूमल-महेंद्र की कहानी

जैसलमेर के लौद्रवा की राजकुमारी मूमल और अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के राणा महेंद्र की प्रेम कहानी सदियों पुरानी है। इस कहानी को जानने के लिए दैनिक भास्कर जैसलमेर से 14 किलोमीटर दूर लौद्रवा गांव पहुंचा। पूरा एपिसोड…
2. कांच का पानी और शीशों का खेल:हजारों राजकुमार नाकाम, फिर अमरकोट के राणा ने कैसे पार की मूमल की खतरनाक पहेलियां? मूमल-महेंद्र प्रेम-कहानी एपिसोड-2

मूमल इंतजार में थी उस राजकुमार के जो उसकी खूबसूरती से ज्यादा उसकी पहेलियों की गहराई को समझ सके। लौद्रवा का महल उसी का स्वागत करेगा जो बिना डरे काक महल की पहेलियों को सुलझा पाएगा। पूरा एपिसोड…
3. मीलों का सफर और वो एक रात:आधी रात मूमल के कमरे में राणा महेंद्र ने ऐसा क्या देखा कि बिना मिले लौट गए? एपिसोड-3

वो रात बातों और वादों में बीत गई। मूमल और महेंद्र अब एक–दूसरे के प्रेम में बंध चुके थे। दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया, लेकिन एक बड़ी समस्या थी? पूरा एपिसोड…
4. एक गलतफहमी से हारा राणा महेंद्र का विश्वास:महेंद्र-मूमल की प्रेम कहानी का वो अंत, जिसे सुनकर आज भी रोता है जैसलमेर का रेगिस्तान, एपिसोड 4

राणा महेंद्र को हुई गलतफहमी की पीड़ा मूमल के लिए असहनीय थी। उसने राणा को कई संदेश भिजवाए, लेकिन मूमल का एक भी संदेश राणा तक नहीं पहुंचा। पूरा एपिसोड…

