Tuesday, October 13, 2026
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झोपड़ी से शुरू हुआ सफर, अब 800 लीटर दूध से बनती है बालूशाही


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Bhutahi Balushahi Mithai: बिहार के सीतामढ़ी जिले का भुतही गांव अपनी ऐतिहासिक मिठास के लिए देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खास पहचान बनाया हुआ है. यहां पिछले 150 से 200 वर्षों से चली आ रही पारंपरिक ‘बालूशाही’ स्वाद के शौकीनों के बीच बेहद लोकप्रिय है. मिट्टी और झोपड़ी की छोटी सी दुकान से शुरू हुआ यह सफर आज पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुका है. सबसे खास बात यह है कि 10 दिनों तक बिना खराब हुए तरोताजा रहने वाली यह मिठाई अपनी शुद्धता और पारंपरिक विधि के कारण आज भी हर वर्ग की पहली पसंद बनी हुई है.

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​भुतही बाजार स्थित सबसे पुराना सुंदर मिष्ठान भंडार के वर्तमान संचालक और स्वर्गीय लक्ष्मी साह के चौथी पीढ़ी के वंशज पवन कुमार बताते हैं कि इस दुकान की नींव उनके परदादाजी ने रखी थी. शुरुआत में झोपड़ी में बनने वाली यह मिठाई धीरे-धीरे अपनी गुणवत्ता के बल पर दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई. पवन कुमार के अनुसार, 1980-85 के दशक में जहां यह बालूशाही 40 से 45 रुपये प्रति किलो बिकती थी.

शुरुआती दिनों में इसकी कीमत महज 15 से 20 रुपये थी. आज समय के साथ बदलाव जरूर आया है और वर्तमान में यह 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से बिक रही है, लेकिन इसके पारंपरिक स्वाद में कोई कमी नहीं आई है. जहां बाजार में अमूमन बालूशाही बनाने के लिए मैदा या सूजी का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है. वहीं, भुतही की बालूशाही की असली यूएसपी इसका शुद्ध छेना है.

कारीगर राजकुमार साह, जो पिछले 20 वर्षों से यहां काम कर रहे हैं, बताते हैं कि वे किसी भी तरह के मिल्क पाउडर या मिलावटी चीजों का प्रयोग नहीं करते है. यहां शुद्ध भैंस के दूध से छेना तैयार किया जाता है. 7 किलो छेना में केवल 200 से 300 ग्राम सूजी मिठाई को खिलने के लिए मिलाई जाती है. इसके अलावा, इसे पकाने के लिए एलपीजी गैस के बजाय कोयले की भट्टी और गाय के गोबर के उपलों का इस्तेमाल होता है, जिससे इसमें एक खास सौंधा स्वाद आता है.

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​भुतही की इस बालूशाही की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां एक दुकान में रोजाना लगभग 8 क्विंटल (800 लीटर) शुद्ध दूध की खपत होती है. स्थानीय गांव-देहात और आसपास के इलाकों जैसे बिसनपुर और संपुर के वेंडर हर सुबह ताजा दूध लेकर पहुंचते हैं. कारीगरों की मेहनत और शुद्धता के चलते यहां रोजाना औसतन 6 से 7 क्विंटल बालूशाही तैयार होकर हाथों-हाथ बिक जाती है.10 किलो छेना को पकाने के लिए लगभग 20 किलो चीनी की चाशनी का उपयोग किया जाता है. इसमें कोई तेल या घी का प्रयोग नहीं किया जाता है और नहीं इसे फ्राई किया जाता है. ये चीनी की चाशनी में पकता है.

​भुतही की बालूशाही की शेल्फ लाइफ यानि टिकाऊपन काफी अधिक होती है, जिसके कारण यह 10 दिनों तक बिना किसी प्रिजर्वेटिव के भी खराब नहीं होती है. यही वजह है कि जब भी कोई स्थानीय निवासी या रिश्तेदार बाहर जाता है, तो भुतही की बालूशाही सौगात के रूप में साथ ले जाना नहीं भूलता है. सीतामढ़ी आने वाले पर्यटक और प्रवासी भारतीय इसे विशेष रूप से पैक करवाकर देश के कोने-कोने और विदेशों तक ले जाते हैं, जिससे यह पारंपरिक मिष्ठान बिहार का गौरव बनी हुई है.

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