Thursday, October 15, 2026
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बड़वानी- 400 साल पुराना है ये माता रानी का मंदिर: राजा को स्वप्न में दिखी थीं मां कालिका देवी, राजा के वंशज आते हैं पूजन करने – Barwani News




बड़वानी के पाला बाजार में मां कालिका का एक अनोखा मंदिर है। करीब 400 साल पहले मां कालिका ने राजा को सपने में दर्शन दिए थे। खुदाई में मां की स्वयंभू प्रतिमा मिली, जिसके बाद से यह मंदिर आस्था का केंद्र है। मंदिर समिति के अनुसार, राजा ने बताए स्थान पर खुदाई कराई थी। वहां प्रतिमा के साथ पानी का एक स्रोत भी मिला, जो कुआं बन गया। मान्यता है कि यह कुआं कभी नहीं सूखता, गर्मियों में भी इसमें पानी बना रहता है। महाराजा ने प्रतिमा को पहले पीपल के पेड़ के नीचे स्थापित किया था। मंदिर बनने के बाद भी प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली। मां कालिका आज भी पीपल के पेड़ के नीचे ही विराजमान हैं। राजपरिवार की कुलदेवी नवरात्रि में मां का नौ दिनों तक अलग-अलग रूपों में विशेष श्रृंगार होता है। राजपरिवार की कुलदेवी होने के कारण अष्टमी पर राजपरिवार के सदस्य पूजा-हवन के लिए आते हैं। मां कालिका रथ पर नगर भ्रमण पर भी निकलती हैं। दशहरे के बाद श्रद्धालुओं और नगरवासियों के सहयोग से नगर भोज का आयोजन भी किया जाता है। करीब चार शताब्दियों से चली आ रही आस्था, स्वयंभू प्रतिमा की मान्यता और कभी न सूखने वाले कुएं की कहानी के कारण पाला बाजार का मां कालिका मंदिर बड़वानी की धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है। आज तक नहीं सूखा कुआं मंदिर समिति के अमित दुबे और हितेश अग्रवाल बताते हैं कि “जिस कुएं से मां की प्रतिमा निकली है, श्रद्धालु उस कुएं के जल को पवित्र मानते हैं. पुराने समय में श्रद्धालु ब्रह्म मुहूर्त में यहां स्नान कर पूजा करते थे और कहते थे कि इस कुएं के पानी से स्नान करने से लोग बीमारियों से दूर रहते हैं। यहां के बुजुर्गों के मुताबिक, गर्मियों में पूरे शहर का वाटर लेवल कम हो जाता है। कुएं सूख जाते हैं और हैंडपंप से पानी निकलना बंद हो जाता है। इस दौरान भी इस कुएं में पानी भरा रहता है।” नवरात्रि में हर दिन विशेष श्रृंगार नवरात्रि में मां के 9 रूपों का विशेष श्रृंगार किया जाता है। समिति के सदस्य बताते है कि “हर दिन मां को अलग-अलग आभूषणों और पारंपरिक वेश-भूषा में सजाया जाता है। सोने-चांदी के आभूषणों से सजे श्रृंगार का नजारा भक्तों के लिए आकर्षण बन जाता है। राजा परिवार की कुलदेवी होने के नाते हर साल अष्टमी के दिन राजपरिवार के सदस्य पूजा-हवन के लिए आते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है।



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