विश्व वन हेल्थ दिवस के मौके पर नालंदा विश्वविद्यालय में वन हेल्थ को गति देने वाले क्षेत्रीय कारक’ विषय पर अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज एंड लिटरेचर/ह्यूमैनिटीज अंतर्गत संचालित साइंस, टेक्नोलॉजी एवं पॉलिसी स्टडीज विभाग द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में भारत, भूटान, बांग्लादेश और नेपाल के नीति-निर्माताओं व वैज्ञानिकों ने भाग लिया। आर्थिक विकास व तकनीकी समानता का जरिया है ‘वन हेल्थ’ उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी ने कहा कि वन हेल्थ को केवल जनस्वास्थ्य तक सीमित न रखकर इसे आर्थिक विकास, तकनीकी समानता और वैश्विक सहयोग के नजरिए से देखा जाना चाहिए। उन्होंने भारत की तेजी से बढ़ती जैव-अर्थव्यवस्था, टीका निर्माण और नैदानिक क्षमताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि समान चुनौतियों से जूझ रहे विकासशील देशों को एक-दूसरे के संसाधनों और तकनीकी ज्ञान का लाभ उठाना चाहिए। रोकथाम, निगरानी और उभरती तकनीकों पर बल भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय की वैज्ञानिक डॉ. संगीता अग्रवाल ने राष्ट्रीय वन हेल्थ मिशन की रूपरेखा रखते हुए एकीकृत निगरानी और 54 प्राथमिकता वाले रोगाणुओं की पहचान पर प्रकाश डाला। जैव प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार डॉ. एस. आर. राव ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जीनोमिक्स, अपशिष्ट जल निगरानी और रोगाणुरोधी प्रतिरोध से निपटने के लिए साझा पूर्व चेतावनी तंत्र विकसित करने पर जोर दिया। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार को अपनाकर… वहीं संचार मंत्रालय के वरिष्ठ सलाहकार अभिमन्यु सिंह ने आर्थिक पहलू रखते हुए कहा कि महामारी फैलने के बाद प्रबंधन पर होने वाले भारी खर्च की तुलना में पूर्व रोकथाम कहीं अधिक सस्ती है। भूटान के एफसीबीएल निदेशक छिमे छेवांग ने जलवायु परिवर्तन के पारिस्थितिकी पर असर, विद्यासागर विवि के डॉ. सुरोजित दास ने वन्यजीवों में रोगाणुरोधी प्रतिरोध के खतरे और विश्वविद्यालय के डीन प्रो. डी. वेंकट राव ने ‘चरक संहिता’ के हवाले से पारंपरिक ज्ञान व आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विचार रखे। वेबिनार में विशेषज्ञों ने एक स्वर में माना कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के विचार को अपनाकर ही जलवायु परिवर्तन, रोगाणुरोधी प्रतिरोध और संक्रामक बीमारियों से निपटा जा सकता है।
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