Monday, June 15, 2026
Homeदेशसाल 2026: BJP को ममता का गढ़ भेदने की उम्मीद, कांग्रेस के...

साल 2026: BJP को ममता का गढ़ भेदने की उम्मीद, कांग्रेस के सामने क्या-क्या चुनौती?


राजनीतिक दलों के लिए हर नया साल अपने साथ उम्मीदें और चुनौतियां लेकर आता है. साल 2026 भी इससे अलग नहीं रहने वाला. जहां भाजपा-नीत एनडीए को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सत्ता दुर्ग में सेंध लगाने की उम्मीद है, तो वहीं विपक्षी दलों को अपने थोड़े बहुत बचे गढ़ों को सुरक्षित रखने की चुनौती से जूझना पड़ सकता है. साल 2026 की पहली छमाही में चार राज्यों (पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम) और एक केंद्र शासित प्रदेश (पुडुचेरी) में विधानसभा चुनाव होने हैं. राजनीतिक दृष्टि से चारों राज्य अहम हैं, लेकिन इनमें से पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के चुनाव परिणाम न सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित करेंगे, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं.

अगर इतिहास के पन्नों में झांका जाए तो अंग्रेजी शासन के दौर में दो किले विशेष रूप से सत्ता के प्रतीक थे. एक, तत्कालीन बंगाल प्रांत में स्थित फोर्ट विलियम और दूसरा, तत्कालीन मद्रास प्रांत (आज का तमिलनाडु) में बना फोर्ट सेंट जॉर्ज. ये दोनों दुर्ग फिरंगी हुकूमत की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत के केंद्र थे. इन किलों को चुनौती देना सीधे-सीधे अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के बराबर माना जाता था. आज के राजनीतिक संदर्भ में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार और तमिलनाडु की एमके स्टालिन सरकार की तुलना अंग्रेजी दौर के उन सत्ता-दुर्गों से करना तार्किक तौर सटीक न भी हो, फिर भी कह सकते हैं कि मौजूदा भारतीय राजनीति में ये दोनों राज्य विपक्ष के सबसे मजबूत गढ़ बने हुए हैं. इन दोनों गढ़ों का राजनीतिक रूप से ढहना देश में विपक्ष की आवाज के काफी हद तक कमजोर पड़ जाने का संकेत होगा. पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अब तक इन दोनों अभेद्य राजनीतिक किलों को भेदने में सफल नहीं हो सकी है. लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में यह जोड़ी पूरी तैयारी और उम्मीद के साथ पहली बार इन दुर्गों को फतह करने के इरादे से मैदान में उतरेगी.

तमिलनाडु और बंगाल में भाजपा का दांव
तमिलनाडु में भाजपा का इतना दांव पर नहीं लगा है, जितना कि बंगाल में है. तमिलनाडु में वैसे भी भाजपा अन्नाद्रमुक की ‘बी’ टीम के तौर पर काम करेगी, लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी के किले में सेंध लगाने के लिए वह सबकुछ झोंकने को तत्पर नजर आ रही है. बंगाल के चुनावी नतीजे केवल राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे 2029 के आम चुनावों की पूर्वपीठिका भी तय कर देंगे. भाजपा के लिए बंगाल जीतना 2029 के चुनावी समर में उसे एक तरह से वॉकओवर दिलाने के समान होगा. लेकिन अगर ममता बनर्जी इतने भारी ध्रुवीकरण और मतदाता सूचियों में हेराफेरी के आरोपों के बीच भी अपने गढ़ को बचाने में कामयाब रहती हैं तो विपक्षी दलों के बीच उनका कद और भी बढ़ जाएगा. बहुत अच्छी हिंदी न जानने और राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्यता न होने के बावजूद वे विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए एक स्वाभाविक दावेदार बन जाएंगी.

स्टालिन का बढ़ेगा कद?
अगर स्टालिन भी अपने राजनीतिक दुर्ग को सुरक्षित रखने में सफल रहते हैं तो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की रणनीति और मुद्दों के निर्धारण में उनका प्रभाव बढ़ जाएगा. वे खुद को उस तरह की केंद्रीय भूमिका में देखने लगेंगे, जैसी भूमिका एन.टी. रामाराव ने 1990 के दशक में निभाई थी. रामाराव ने उस वक्त केंद्र में राजीव गांधी की सरकार को चुनौती देने के लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर दी थी.

किस चौराहे पर और किस चुनौती के साथ खड़ी है कांग्रेस
जहां तक कांग्रेस का सवाल है, इस समय वह राजनीतिक रूप से चौराहे पर खड़ी दिखाई देती है. उसके लिए केरल जैसे अपेक्षाकृत छोटे राज्य के विधानसभा चुनाव भी अपने सियासी वजूद को जिंदा रखने की लड़ाई बन चुके हैं. केरल के चुनाव कांग्रेस के लिए एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं. यहां कांग्रेस-नीत यूडीएफ का सीधा मुकाबला वामदलों के एलडीएफ से है, जो पिछले एक दशक से राज्य की सत्ता पर काबिज है. एलडीएफ के प्रति सत्ता विरोधी रुझान होने के बावजूद कांग्रेस के लिए शशि थरूर, केसी वेणुगोपाल और पार्टी के अन्य महत्वाकांक्षी नेताओं के बीच संतुलन स्थापित कर चुनाव जीतना एक बड़ी चुनौती है.

नए साल में कांग्रेस की नई चुनौती
हालांकि संभावना कम है, लेकिन अगर कांग्रेसनीत गठबंधन को हराकर वामदल फिर से सत्ता में आ जाते हैं तो दक्षिण में भी कांग्रेस का सितारा अस्त होने के कगार पर आ जाएगा. पार्टी पहले से ही कर्नाटक में सत्तासीन होने के बावजूद सियासी ऊहापोह की स्थिति में है. नया साल यहां भी पार्टी के लिए एक नई चुनौती लेकर आएगा. कांग्रेस नेतृत्व को जल्द ही डीके शिवकुमार और सिद्धारमैया के बीच की रस्साकशी पर कोई स्पष्ट और सख्त निर्णय लेना होगा, अन्यथा इसका असर न केवल राज्य सरकार की स्थिरता पर, बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय साख पर भी पड़ेगा.

कांग्रेस में दिखेंगे क्या बदलाव
2026 में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में भी कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं. अगर कांग्रेस केरल में सत्ता में आ जाती है, जिसको लेकर कांग्रेसी बहुत आश्वस्त भी नजर आ रहे हैं, तो पार्टी के मौजूदा संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल वहां मुख्यमंत्री बनना चाहेंगे. कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी चाहते हैं कि वेणुगोपाल राज्य की सक्रिय राजनीति में लौटें, ताकि संगठन महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी किसी ऐसे अपेक्षाकृत युवा चेहरे को सौंपी जा सके, जो पार्टी की संगठनात्मक जड़ता को तोड़ सके.

प्रियंका पर अब तक सस्पेंस
कांग्रेस में अब तक प्रियंका गांधी को कोई बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नहीं दी गई है. ऐसे समय में जब कांग्रेस अपने इतिहास के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है, प्रियंका को लगातार परदे के पीछे रखना न केवल राजनीतिक विश्लेषकों, बल्कि स्वयं पार्टी के कई नेताओं के लिए भी एक रहस्य बना हुआ है. क्या आलाकमान नए साल में प्रियंका और सचिन पायलट की जोड़ी को नई जिम्मेदारी देकर पार्टी के कायाकल्प की इच्छा दिखाएगी, यह भी देखने वाली बात होगी.



Source link

RELATED ARTICLES
- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments